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कर्बला सिर्फ एक जंग नहीं, सब्र और सच्चाई की सबसे बड़ी मिसाल है

जालना की गुलजार मस्जिद में मोहर्रम पर संबोधित करते हुए मौलाना गुलाम जिलानी मिस्बाही, जिन्होंने इमाम हुसैन (रज़ि.) की शहादत को सब्र, इंसाफ़ और सच्चाई की सबसे बड़ी मिसाल बताया।

इमाम हुसैन (रज़ि.) की शहादत को याद कर भावुक हुए मौलाना गुलाम जिलानी मिस्बाही, बोले— मोहर्रम में दिखावा नहीं, इबादत और इंसानियत को अपनाइए

📍 जालना | NewsNationOnline

“अगर सिर झुकाना ही मकसद होता, तो कर्बला का इतिहास कभी नहीं बनता. हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने दुनिया को यह पैगाम दिया कि सिर कट सकता है, लेकिन ज़ुल्म, बातिल और नाइंसाफ़ी के आगे कभी नहीं झुक सकता. कर्बला हमें सिखाती है कि जिस सिर ने अल्लाह के सिवा किसी के आगे सज्दा नहीं किया, वह ज़ुल्म और बातिल के सामने भी कभी नहीं झुका. हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने अपनी जान कुर्बान कर दी, लेकिन सत्य, इंसाफ़ और दीन के उसूलों से समझौता नहीं किया. सिर कट गया, लेकिन ज़ुल्म के सामने नहीं झुका—कर्बला का यही वह पैगाम है, जिसने हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) को पूरी इंसानियत के लिए सब्र, हिम्मत और सच्चाई की अमर मिसाल बना दिया.” 

Front page of a Hindi newspaper with a large red and black headline reading 'कर्बला सिर्फ एक जंग नहीं, सब और सच्चाई की सबसे बड़ी मिसाल है' and a photo of a bearded man in a patterned cap giving a speech at a mosque.

मोहर्रम के पवित्र महीने की आमद के साथ जालना की गुलजार मस्जिद में जुमे की नमाज़ से पहले पेश इमाम मौलाना गुलाम जिलानी मिस्बाही ने शहीद-ए-कर्बला हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) की महान कुर्बानी पर भावुक और प्रेरणादायी बयान दिया। उन्होंने कहा कि कर्बला का वाक़या केवल इस्लामी इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत के लिए सब्र, हिम्मत, इंसाफ़ और सच्चाई की ऐसी मिसाल है, जिसे क़यामत तक भुलाया नहीं जा सकता।

उन्होंने कहा कि कर्बला हमें सिखाती है कि जिस सिर ने अल्लाह के सिवा किसी के आगे सज्दा नहीं किया, वह ज़ुल्म और बातिल के सामने भी कभी नहीं झुका। हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने अपनी जान कुर्बान कर दी, लेकिन सत्य, इंसाफ़ और दीन के उसूलों से समझौता नहीं किया। सिर कट गया, लेकिन ज़ुल्म के सामने नहीं झुका—कर्बला का यही वह पैगाम है, जिसने हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) को पूरी इंसानियत के लिए सब्र, हिम्मत और सच्चाई की अमर मिसाल बना दिया।

मौलाना मिस्बाही ने कहा कि आज दुनिया में अगर कोई कर्बला से सबसे बड़ा सबक सीख सकता है, तो वह यह है कि हालात कितने भी मुश्किल क्यों न हों, इंसान को अपने ईमान, अपने उसूल और सच्चाई का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए।


कर्बला में सब कुछ कुर्बान कर दिया, लेकिन ज़ुल्म के आगे सिर नहीं झुकाया

अपने बयान में मौलाना मिस्बाही ने कहा कि कर्बला के मैदान में हज़रत इमाम हुसैन (रज़ि.) ने अपने परिवार, साथियों और यहां तक कि अपने मासूम बच्चों की भी कुर्बानी दी, लेकिन यज़ीद की बैअत स्वीकार नहीं की। उन्होंने हर हाल में अल्लाह की इबादत को सबसे ऊपर रखा और पूरी दुनिया को यह बता दिया कि ईमान की हिफाज़त के लिए सबसे बड़ी कुर्बानी भी छोटी पड़ जाती है।

उन्होंने कहा कि यही वजह है कि आज लगभग चौदह सौ साल बाद भी दुनिया भर में लोग इमाम हुसैन (रज़ि.) को इज़्ज़त, मोहब्बत और अकीदत के साथ याद करते हैं।


मोहर्रम सिर्फ मातम का नहीं, खुद का मुहासबा करने का महीना है

मौलाना ने कहा कि मोहर्रम इस्लामी साल का पहला महीना है और इसकी अपनी खास अहमियत है। आशूरा (10 मोहर्रम) का दिन इस्लामी इतिहास में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। कई सुन्नी इस्लामी परंपराओं में इस दिन रोज़ा रखने की बड़ी फ़ज़ीलत बयान की गई है और पैगंबर हज़रत मुहम्मद ﷺ ने भी आशूरा के रोज़े की तरगीब दी है।

उन्होंने कहा कि मुसलमानों को इस महीने में—

  • नमाज़ की पाबंदी करनी चाहिए।
  • रोज़े रखने चाहिए।
  • कुरआन की तिलावत करनी चाहिए।
  • नियाज़ और फ़ातिहा का एहतमाम करना चाहिए।
  • गरीबों और ज़रूरतमंदों की सदक़ा व ख़ैरात के ज़रिए मदद करनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि यही असली हुसैनी किरदार है।


“आज हमें हुसैनी बनने की ज़रूरत है”

मौलाना मिस्बाही ने कहा कि आज हर मुसलमान को खुद से सवाल करना चाहिए कि क्या हम सिर्फ मोहर्रम मना रहे हैं या इमाम हुसैन (रज़ि.) की ज़िंदगी से कुछ सीख भी रहे हैं?

उन्होंने कहा कि अगर इंसान के अंदर सब्र नहीं, शुक्र नहीं, ईमानदारी नहीं और अल्लाह की इबादत नहीं, तो फिर सिर्फ रस्में निभाने से कोई फायदा नहीं होगा। असली हुसैनी वही है जो अपने किरदार, अपने अख़लाक़ और अपने अमल से इस्लाम की खूबसूरती पेश करे।


गैर-शरई रस्मों से बचने की अपील

मौलाना ने अपने बयान में कहा कि मुसलमानों को हर उस काम से बचना चाहिए जो शरीयत के खिलाफ हो।

उन्होंने कहा कि ताज़िया बनाना, सवारी निकालना, इनके लिए चंदा इकट्ठा करना, मन्नतें मांगना, चढ़ावा चढ़ाना, फूल बरसाना, नाच-गाना, ढोल-ताशे बजाना, जानवरों का रूप धारण करना और ऐसे दूसरे रिवाज इस्लामी शिक्षाओं के अनुरूप नहीं हैं।

उन्होंने लोगों से अपील की कि वे ऐसे कामों से दूर रहें और मोहर्रम को इबादत, तौबा और नेक अमल के साथ गुजारें।

उन्होंने यह भी कहा कि सड़कों को जाम करना, फिजूलखर्ची करना, नशा करना या किसी भी तरह से आम लोगों को परेशानी पहुंचाना भी इस्लाम की शिक्षा के खिलाफ है। हर मुसलमान की जिम्मेदारी है कि वह अपने धर्म का परिचय अपने अच्छे व्यवहार और अनुशासन से दे।


इस्लाम मोहब्बत, इंसाफ और भाईचारे का पैगाम देता है

मौलाना मिस्बाही ने कहा कि इस्लाम नफरत नहीं, बल्कि मोहब्बत सिखाता है। यह मजहब इंसाफ, भाईचारा, ईमानदारी और इंसानियत की हिफाज़त का पैगाम देता है। इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि वह अपने किरदार से समाज में अमन और भाईचारे का माहौल बनाए।

उन्होंने कहा कि अहले सुन्नत व जमाअत के बड़े उलेमा और बुज़ुर्गों, खासकर आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी (रह.) ने भी मुसलमानों को गैर-शरई रस्मों से बचने और शरीयत के मुताबिक जिंदगी गुजारने की नसीहत की है।


डॉ. इक़बाल का शेर सुनाकर खत्म किया बयान

अपने संबोधन के आखिर में मौलाना ने अल्लामा डॉ. इक़बाल का मशहूर शेर पढ़ा—

“वो एक सज्दा जिसे तू गिराँ समझता है,
हज़ार सज्दों से देता है आदमी को निजात।”

उन्होंने कहा कि मोहर्रम का असली पैगाम यही है कि इंसान अपने रब से रिश्ता मजबूत करे, गरीबों की मदद करे, सच्चाई का साथ दे और हज़रत इमाम हुसैन (रज़ि.) की कुर्बानी से सब्र, शुक्र और हिम्मत का सबक लेकर अपनी जिंदगी को बेहतर बनाए।


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Imran Siddiqui

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