संकट से उपजी अस्मिता : नीट का घपला और नई पीढ़ी की हुंकार — श्याम सारस्वत
“भगवान जो करता है अच्छे के लिए करता है,” इस कहावत का अहसास इतिहास हमें समय-समय पर कराता है। जब समाज या देश किसी अत्यंत गंभीर संकट से गुजरता है, तो उसी संकट के गर्भ से एक नई क्रांति या बदलाव का जन्म होता है। देश के लाखों विद्यार्थियों के भविष्य को दांव पर लगाने वाला नीट (NEET) परीक्षा का घपला और पेपर लीक का प्रकरण इसी का एक ज्वलंत उदाहरण है।
वर्षानुवर्षे दिन-रात एक करके, दिनभर पढ़ाई और रात में सपने देखने वाले प्रामाणिक विद्यार्थियों की मेहनत पर जब धांधली और भ्रष्टाचार का पानी फिर गया, तो पूरा देश हिल गया। दो-दो बार परीक्षा देने के बाद भी उचित परिणाम न मिलना यह केवल प्रशासनिक भूल नहीं है, बल्कि देश की गुणवत्ता पर हुआ एक बड़ा आघात है।
राजनीतिक व्यवस्था का यथार्थ और भ्रम का बुलबुला
कुछ वर्षों पूर्व देश में एक ऐसा चलन बना दिया गया था कि एक विशिष्ट राजनीतिक विचारधारा या पार्टी के बिना यह देश चलना संभव ही नहीं है। कांग्रेस या अन्य विकल्पों के बाद भारत कौन चलाएगा? जब ऐसा प्रश्न पूछा जा रहा था, तब भाजपा के रूप में जनता ने एक बड़े बदलाव की अपेक्षा की थी।
परंतु, नीट परीक्षा जैसे अत्यंत संवेदनशील विषय में हुआ घपला, पेपर लीक के प्रकरण और उसके बाद प्रशासन द्वारा दिखाई गई उदासीनता से एक बात पर मुहर लग गई। सत्ता कोई भी हो, व्यवस्था की त्रुटियां और कुप्रबंधन अपने आप समाप्त नहीं होते। राजनीतिक दलों के दावों और वास्तविकता में पारदर्शिता के बीच एक बड़ी खाई होती है, इस प्रकरण ने इसे जनता के सामने उजागर कर दिया। प्रशासनिक स्तर पर यह विफलता केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के भविष्य से जुड़ा हुआ प्रश्न है।
नई पीढ़ी पर आक्षेप और जन्मा हुआ आशा की किरण
पिछले कुछ वर्षों में हमारे समाज के बुजुर्गों और विचारकों द्वारा एक बात को लेकर बड़ी चिंता व्यक्त की जा रही थी—आज की नई पीढ़ी अत्यंत स्वार्थी है, उन्हें केवल डिग्री हासिल करने, अच्छे पैकेज की नौकरी ढूंढकर देश छोड़ने और अपनी जिंदगी में मौज-मस्ती करने में ही रस है।
नई पीढ़ी देश के मुद्दों से दूर रहने वाली, सामाजिक प्रतिबद्धता न मानने वाली है, ऐसी एक आम धारणा बन गई थी। परंतु, नीट के इस अन्याय ने इस धारणा को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया। जब जंतर-मंतर पर हजारों युवा सड़कों पर उतरे, तो उन्होंने यह साबित कर दिया कि:
* यह पीढ़ी अन्याय के खिलाफ चुप रहने वाली नहीं है।
* उनमें केवल किताबी ज्ञान नहीं है, बल्कि ‘लड़ने की क्षमता’ और ‘अपने अधिकार मांगने का साहस’ भी है।
* हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था और स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार हो, इसके लिए उनके मन में उतना ही जज्बा और प्रेम है।
जंतर-मंतर पर हुआ शांतिपूर्ण लेकिन आक्रामक आंदोलन इस बात का प्रतीक है कि जब-जब देश के बुनियादी मूल्यों पर आघात होगा, तब-तब यह युवा पीढ़ी देश के पीछे ढाल बनकर खड़ी रहेगी।
‘भगवान जो करता है अच्छे के लिए करता है’
यदि नीट का पेपर लीक न हुआ होता, तो शायद इस व्यवस्था में रचे-बसे भ्रष्टाचार और पारदर्शिता के अभाव का कभी पता नहीं चल पाता। इस संकट ने हमें कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाए हैं:
* तंत्र की पोलखोल: NTA जैसी राष्ट्रीय स्तर की संस्थाओं की त्रुटियां सबके सामने आ गईं, जिसके कारण अब परीक्षा की पूरी पद्धति में सुधार करने के लिए सरकार मजबूर हो रही है।
* युवा शक्ति का संगठन: इस प्रकरण ने देश भर के विद्यार्थियों को जाति, पाति, भाषा और क्षेत्र की सीमाओं से परे जाकर एक छत के नीचे ला खड़ा किया।
* जागृत नागरिकता: युवाओं को उनके अधिकारों का अहसास हुआ और ‘अपने भविष्य के लिए हमें खुद लड़ना चाहिए’ यह आत्मविश्वास उनमें पैदा हुआ।
नीट पेपर लीक के कारण लाखों विद्यार्थियों का नुकसान हुआ, यह निश्चित रूप से बेहद बुरा और पीड़ादायक है। किंतु, इस अंधकार से बाहर निकला ‘युवा क्रांति’ का प्रकाश देश के उज्ज्वल भविष्य की नांदी है। जब-जब किसी देश के युवा अन्याय सहन करना अस्वीकार करते हैं और सड़कों पर उतरकर व्यवस्था से सवाल पूछते हैं, तब वह देश वास्तविक अर्थों में जीवित और मजबूत होता है।
जंतर-मंतर पर जलाई गई संघर्ष की यह मशाल यही सिद्ध करती है कि भारत देश का भविष्य केवल राजनेताओं के हाथों में सुरक्षित नहीं है, बल्कि वह इस देशप्रेमी, संघर्षशील और जागृत युवा पीढ़ी के हाथों में पूरी तरह सुरक्षित है।
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शाम नंदलाल सारस्वत, जालना
संपर्क — 8855054930

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