
‘सरकारी काम में बाधा’ या प्रशासनिक दादागिरी? वकीलों के हाथ बांधकर कब तक पिसती रहेगी जनता?
सार्वजनिक और राजस्व कार्यालयों (महसूल कार्यालय) में काम के सिलसिले में जाने वाले आम नागरिकों और कानून के रक्षकों (वकीलों) को परेशान किया जाना अब कोई नई बात नहीं रह गई है। घंटों तक बिठाकर रखना, अपने अधिकार के काम के बारे में पूछने पर बदतमीजी से जवाब देना और पारदर्शिता के लिए यदि कोई वीडियो या सबूत बनाने का प्रयास करे तो सीधे हाथापाई पर उतर आना, यह कई सरकारी दफ्तरों की दैनिक कार्यशैली बन चुकी है।
सबसे गंभीर बात यह है कि यदि कोई कर्मचारी खुद पहले उकसाता है, अपमानित करता है या सीधे हाथ उठाता है, तब भी अंत में शिकार आम नागरिक या वकील ही बनता है।
‘सरकारी काम में बाधा’ – एक सुविधाजनक हथियार
जब भी कोई नागरिक या वकील अपने काम का हिसाब मांगता है, तब प्रशासनिक तंत्र द्वारा ‘सरकारी काम में बाधा’ (भारतीय न्याय संहिता – BNS की धारा 132/121) रूपी हथियार का इस्तेमाल किया जाता है।
- दफ्तर की गुटबाजी: कोई भी घटना होते ही पूरा कार्यालय एक हो जाता है और शिकायतकर्ता को ही दोषी ठहराकर पुलिस स्टेशन पर दबाव बनाया जाता है।
- काम टालना और हड़ताल: अपनी गलती छिपाने के लिए सीधे ‘काम बंद आंदोलन’ शुरू करके पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को बंधक बना लिया जाता है।
- अधिकारों का दुरुपयोग: जनता के टैक्स से वेतन पाने वाले कर्मचारी खुद को मालिक और जनता या उनके कानूनी प्रतिनिधियों को लाचार समझकर दादागिरी करने लगते हैं। यह रवैया एक प्रकार की ‘प्रशासनिक दबंगई’ प्रतीत होता है।
लोकतंत्र में जनता राजा, लेकिन व्यवस्था में लाचार?
कानून के अनुसार जनता ही सर्वोपरि है और वकील अदालत व कानून का रक्षक होता है। लेकिन धरातल पर प्रशासनिक टेबल पर वकीलों और नागरिकों को नियमों की जंजीरों में जकड़ दिया जाता है, जबकि दूसरी ओर कर्मचारियों की असंवेदनशीलता और मनमानी को ‘संरक्षण’ का ढाल दिया जाता है। कर्मचारी हाथ भी उठाए तो उसे प्रशासनिक समर्थन मिलता है, और यदि वकील या नागरिक खुद का बचाव भी करे, तो उस पर तुरंत मामले दर्ज हो जाते हैं। यह स्थिति लोकतंत्र के सिद्धांतों के पूरी तरह विपरीत है।
इस मनमानी पर कैसे लगे लगाम?
इस चक्र को तोड़ने और प्रशासनिक तानाशाही पर अंकुश लगाने के लिए निम्नलिखित कड़े कदमों की आवश्यकता है:
- डिजिटल पारदर्शिता और CCTV अनिवार्य: सरकारी कार्यालयों की हर टेबल और परिसर CCTV की निगरानी में होना चाहिए, ताकि पहले हाथ किसने उठाया और उकसाया किसने, इसका निष्पक्ष प्रमाण पुलिस को मिल सके।
- ‘सरकारी काम में बाधा’ की धाराओं का पुनर्विचार: यदि कर्मचारी ने स्वयं पहले हिंसा या अभद्रता की है, तो उसे ‘सरकारी काम में बाधा’ की धारा का संरक्षण नहीं मिलना चाहिए, ऐसा स्पष्ट नियम होना आवश्यक है।
- दोषी कर्मचारियों पर तुरंत निलंबन: नागरिकों या वकीलों से दुर्व्यवहार करने वाले कर्मचारियों पर केवल विभागीय जांच का दिखावा न करके सीधी अनुशासनात्मक और कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
नागरिकों के हाथ बांधकर और प्रशासन को असीमित अधिकार देकर कोई भी लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सकता। कानून के रक्षक वकीलों और आम जनता पर हो रहे इस अन्याय को रोकने के लिए अब प्रशासनिक जवाबदेही (Accountability) को कड़ाई से लागू करना समय की मांग है।
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