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कर्जदार की मौत के बाद बीमा दावा खारिज नहीं कर सकता बैंक, उपभोक्ता आयोग का ऐतिहासिक फैसला

कर्जदार की मौत के बाद बीमा दावा

बैंक और बीमा कंपनी को करारा झटका; बीमा राशि से ऋण चुकाने, ₹2 लाख मुआवजा और ₹30 हजार कानूनी खर्च देने का आदेश

जम्मू-कश्मीर/कुपवाड़ा | News Nation Online

बैंक और बीमा कंपनियों की मनमानी पर रोक लगाने वाला एक महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है। जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्जदार के खाते से बीमा प्रीमियम काट लिया गया है, तो उसकी मृत्यु के बाद बैंक एकतरफा तरीके से वह प्रीमियम वापस कर बीमा दावा खारिज नहीं कर सकता।

आयोग ने बैंक और बीमा कंपनी के इस व्यवहार को “सेवा में कमी” तथा “अनुचित व्यापार व्यवहार” माना है। आयोग ने निर्देश दिया कि मृतक कर्जदार को बीमा सुरक्षा का लाभ दिया जाए, बीमा राशि से बकाया ऋण का भुगतान किया जाए तथा मृतक के परिजनों को मानसिक पीड़ा के लिए ₹2 लाख और वाद व्यय के रूप में ₹30 हजार का भुगतान किया जाए। यह फैसला देशभर के बैंक ग्राहकों और ऋणधारकों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है।


क्या है पूरा मामला?

कुपवाड़ा निवासी व्यवसायी मोहम्मद अयूब डार ने अपने ‘न्यू ब्रांड रेडीमेड गारमेंट्स’ व्यवसाय के लिए जम्मू एंड कश्मीर बैंक की कुपवाड़ा शाखा से कैश क्रेडिट ऋण लिया था।

बैंक ने ऋण को बीमा सुरक्षा देने के लिए 6 मई 2022 को उनके खाते से ₹16,000 का बीमा प्रीमियम काट लिया। लेकिन दुर्भाग्यवश 1 जून 2022 को मोहम्मद अयूब डार का निधन हो गया।

परिजनों का आरोप है कि मृत्यु की जानकारी मिलने के बाद बैंक ने 24 जून 2022 को काटा गया बीमा प्रीमियम वापस खाते में जमा कर दिया और यह कहते हुए बीमा दावा अस्वीकार कर दिया कि बीमा पॉलिसी प्रभावी नहीं थी। इसके बाद बैंक ने मृतक की पत्नी शहजादा बेगम और उनके तीन बच्चों से ऋण की वसूली शुरू कर दी।

न्याय नहीं मिलने पर परिवार ने जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।


आयोग ने बैंक की दलील को किया खारिज

मामले की सुनवाई जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष पीरजादा कौसर हुसैन और सदस्य नायला यासीन की पीठ ने की।

बैंक ने आयोग के समक्ष दलील दी कि बीमा पॉलिसी पूरी तरह लागू नहीं हुई थी, इसलिए दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। लेकिन आयोग ने सभी दस्तावेजों और रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद बैंक की दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया।

आयोग ने अपने आदेश में कहा कि जब बैंक स्वयं ग्राहक के खाते से बीमा प्रीमियम काट चुका था और उसे बीमा योजना में शामिल कर चुका था, तब मृत्यु के बाद प्रीमियम वापस करना पूरी तरह अनुचित और गैरकानूनी है।

आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि बैंक और बीमा कंपनी की आंतरिक प्रक्रियागत त्रुटियों का नुकसान ग्राहक या उसके परिवार को नहीं उठाना पड़ेगा। प्रीमियम कटने के बाद ग्राहक को यह वैध विश्वास हो जाता है कि उसका ऋण बीमा सुरक्षा के दायरे में है।


आयोग ने दिए ये अहम निर्देश

उपभोक्ता आयोग ने अपने आदेश में कहा कि—

  • मृतक कर्जदार को उसकी मृत्यु की तिथि पर बीमा योजना के तहत पूर्ण रूप से बीमित माना जाए।
  • बीमा कंपनी पूरी बीमा राशि 5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित उपलब्ध कराए।
  • बीमा राशि से मृतक के बकाया ऋण का भुगतान किया जाए।
  • मृतक के परिजनों से किसी प्रकार की ऋण वसूली न की जाए।
  • मानसिक उत्पीड़न के लिए ₹2 लाख का मुआवजा दिया जाए।
  • वाद व्यय के रूप में ₹30 हजार का भुगतान चार सप्ताह के भीतर किया जाए।

वरिष्ठ अधिवक्ता महेश धन्नावत ने दी महत्वपूर्ण सलाह

इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता महेश धन्नावत ने कहा कि कई बार बैंक और बीमा कंपनियां अपनी आंतरिक त्रुटियों को छिपाने के लिए ग्राहकों के साथ अन्याय करती हैं।

उन्होंने कहा कि ऋण स्वीकृत करते समय बीमा प्रीमियम काट लेना और बाद में जिम्मेदारी से बचने के लिए उसे वापस दिखाकर बीमा दावा अस्वीकार करना पूरी तरह अवैध है।

उन्होंने बैंक ग्राहकों को सलाह दी कि यदि ऋण खाते से बीमा प्रीमियम काटा गया है तो उसकी पासबुक, बैंक स्टेटमेंट, बीमा प्रीमियम की रसीद और ऋण संबंधी सभी दस्तावेज सुरक्षित रखें। यदि बैंक या बीमा कंपनी बीमा लाभ देने से इनकार करे तो बिना हिचकिचाए उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराएं।


ग्राहकों के लिए क्यों है यह फैसला महत्वपूर्ण?

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय उन लाखों लोगों के लिए राहत भरा है, जिन्होंने बैंक से ऋण लेते समय बीमा सुविधा ली है। यह फैसला स्पष्ट करता है कि बैंक या बीमा कंपनी अपनी आंतरिक लापरवाही का खामियाजा ग्राहकों पर नहीं डाल सकती।

यदि बैंक ने बीमा प्रीमियम स्वीकार कर लिया है तो बाद में उसे वापस करके बीमा सुरक्षा समाप्त नहीं की जा सकती। ऐसे मामलों में ग्राहक अपने अधिकारों की रक्षा के लिए उपभोक्ता आयोग का सहारा ले सकते हैं।


कर्जदार की मौत के बाद बीमा दावा


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