108वां उर्स-ए-आला हजरत 7 और 8 अगस्त को दुनिया भर में अकीदत के साथ मनाया जाएगा, गुलजार मस्जिद में हुई प्रेरणादायी तकरीर
जालना | News Nation Online
जालना शहर की गुलजार मस्जिद में जुमे की नमाज़ से पहले आयोजित तकरीर में शहर के प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान एवं पेश इमाम मौलाना गुलाम जिलानी मिस्बाही ने कहा कि इंसान की असली पहचान केवल उसके इल्म (ज्ञान) से नहीं, बल्कि उस इल्म पर किए गए अमल (आचरण) से होती है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने अपनी पूरी ज़िंदगी अल्लाह की इबादत, रसूल-ए-पाक ﷺ की मोहब्बत, इंसानियत की सेवा और समाज की रहनुमाई में गुज़ार दी, वे सदियों तक लोगों के दिलों में ज़िंदा रहते हैं। ऐसे ही महान व्यक्तित्व थे आला हजरत इमाम अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी, जिनकी तालीमात आज भी दुनिया भर के करोड़ों मुसलमानों के लिए रोशनी का मीनार बनी हुई हैं। 108वां उर्स-ए-आला हजरत.
आला हजरत की तालीमात आज भी समाज के लिए मार्गदर्शक
मौलाना गुलाम जिलानी मिस्बाही ने कहा कि आला हजरत केवल आशिक़-ए-रसूल ﷺ ही नहीं थे, बल्कि इल्म, अमल, तक़वा, इंसानियत और बेहतरीन अख़लाक़ का जीवंत उदाहरण थे। उन्होंने अपने पूरे जीवन में यह साबित किया कि यदि इंसान अपने ज्ञान को अपने किरदार का हिस्सा बना ले, तो वह आने वाली पीढ़ियों के लिए आदर्श बन जाता है।
उन्होंने कहा कि आज जब समाज में नैतिक मूल्यों का ह्रास, नफ़रत और भटकाव बढ़ रहा है, ऐसे समय में आला हजरत की शिक्षाएं पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गई हैं। उन्होंने हमेशा लोगों को कुरआन और सुन्नत के अनुसार जीवन जीने, नमाज़ की पाबंदी करने, इंसानियत की सेवा करने, प्रेम फैलाने और श्रेष्ठ चरित्र अपनाने की शिक्षा दी।
70 से अधिक विषयों के विद्वान थे आला हजरत
मौलाना ने बताया कि आला हजरत को लगभग 70 से अधिक विषयों में महारत हासिल थी। तफ़सीर, हदीस, फ़िक़्ह, अरबी, उर्दू, फ़ारसी, तसव्वुफ़, गणित, खगोल विज्ञान सहित अनेक विषयों पर उनकी असाधारण पकड़ थी।
उन्होंने अपने जीवनकाल में 1,400 से अधिक पुस्तकें और रिसाले लिखे, जिनका अध्ययन आज भी भारत सहित विश्वभर के मदरसों, इस्लामी विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में किया जाता है।
बचपन से ही दिखाई दी असाधारण प्रतिभा
मौलाना मिस्बाही ने बताया कि आला हजरत की प्रतिभा बचपन से ही विलक्षण थी। कहा जाता है कि महज़ 10 वर्ष की आयु में उन्होंने अरबी भाषा में पुस्तक लिखी, जबकि 13 वर्ष की आयु में अपना पहला फ़तवा तैयार किया।
उन्होंने बताया कि उनकी इल्मी काबिलियत देखकर वरिष्ठ उलेमा भी आश्चर्यचकित रह जाते थे और कम उम्र में ही उन्हें फ़तवे जारी करने की जिम्मेदारी सौंप दी गई थी।
उन्होंने यह भी बताया कि केवल छह वर्ष की आयु में आला हजरत ने एक विशाल जनसमूह के सामने लगभग ढाई घंटे तक प्रभावशाली तकरीर की थी, जिसने उनकी असाधारण प्रतिभा को दुनिया के सामने प्रस्तुत किया।
‘हदाइक़-ए-बख्शिश’ और ‘कंजुल ईमान’ आज भी हैं मार्गदर्शक
मौलाना ने कहा कि आला हजरत एक महान इस्लामी विद्वान होने के साथ-साथ उच्च कोटि के शायर भी थे। पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मोहम्मद ﷺ की शान में लिखा गया उनका प्रसिद्ध नातिया कलाम “हदाइक़-ए-बख्शिश” आज भी दुनिया भर में मोहब्बत और अकीदत के साथ पढ़ा जाता है।
उन्होंने बताया कि उनके नातिया अशआर में इश्क़-ए-रसूल ﷺ की ऐसी गहराई है, जो हर पढ़ने और सुनने वाले के दिल को छू लेती है। यही कारण है कि उनके लिखे नात और सलाम आज भी दुनिया भर की महफ़िलों, मीलाद और उर्स की शान बने हुए हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि आला हजरत द्वारा किया गया कुरआन-ए-करीम का प्रसिद्ध उर्दू तर्जुमा “कंजुल ईमान” अहल-ए-सुन्नत के बीच अत्यंत सम्मान के साथ पढ़ा जाता है और इसकी सरल एवं साहित्यिक भाषा ने लाखों लोगों को कुरआन के संदेश को समझने में सहायता प्रदान की है।
‘फ़तावा रज़विया’ आज भी इस्लामी शोध का महत्वपूर्ण आधार
मौलाना मिस्बाही ने कहा कि आला हजरत की एक और महान कृति “फ़तावा रज़विया” है, जो लगभग 30 खंडों में प्रकाशित विशाल ग्रंथ है। इसमें हजारों धार्मिक एवं सामाजिक प्रश्नों का समाधान कुरआन और हदीस की रोशनी में प्रस्तुत किया गया है।
आज भी दुनिया भर के उलेमा और इस्लामी शोधकर्ता इसे महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ के रूप में उपयोग करते हैं।
इश्क़-ए-रसूल ﷺ से सराबोर थी पूरी ज़िंदगी
उन्होंने कहा कि आला हजरत का संपूर्ण जीवन इश्क़-ए-रसूल ﷺ में डूबा हुआ था। उनकी प्रत्येक पुस्तक, फ़तवा, नात और लेखन में पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मोहम्मद ﷺ के प्रति अथाह प्रेम स्पष्ट दिखाई देता है।
उन्होंने हमेशा यह संदेश दिया कि एक सच्चे मुसलमान की पहचान केवल इबादत से नहीं, बल्कि उसके श्रेष्ठ चरित्र, ईमानदारी, इंसानियत और समाज के प्रति जिम्मेदारी से होती है।
7 और 8 अगस्त को मनाया जाएगा 108वां उर्स-ए-आला हजरत
मौलाना गुलाम जिलानी मिस्बाही ने बताया कि 7 और 8 अगस्त को दुनिया भर में 108वां उर्स-ए-आला हजरत अकीदत और एहतराम के साथ मनाया जाएगा।
उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश के बरेली शरीफ स्थित दरगाह पर लाखों अकीदतमंद हाज़िरी देंगे। इसके अलावा भारत के विभिन्न राज्यों और दुनिया के अनेक देशों में कुरआनख़्वानी, नात-ओ-सलाम, तकरीर, दुआ और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
दुनिया की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटियों में हो रहा है शोध
मौलाना ने कहा कि आज विश्व की अनेक प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटियों में आला हजरत के धार्मिक, साहित्यिक और बौद्धिक योगदान पर गंभीर शोध हो रहे हैं।
उन्होंने बताया कि अमेरिका की यूसी बर्कले और कोलंबिया यूनिवर्सिटी, नीदरलैंड की लीडेन यूनिवर्सिटी, ब्रिटेन की न्यूकैसल यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन, पाकिस्तान की कराची यूनिवर्सिटी, पंजाब यूनिवर्सिटी (लाहौर), अल्लामा इक़बाल ओपन यूनिवर्सिटी (इस्लामाबाद), भारत की पटना यूनिवर्सिटी, सोलापुर यूनिवर्सिटी तथा डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय सहित अनेक संस्थानों में उनके व्यक्तित्व और साहित्य पर शोध कार्य हो चुके हैं और आज भी जारी हैं।
मराठवाड़ा के शोधकर्ताओं का भी महत्वपूर्ण योगदान
मौलाना मिस्बाही ने विशेष रूप से बताया कि जालना के विद्वान डॉ. अब्दुल वहीद काज़ी को “आला हजरत की नातिया शायरी” विषय पर शोध के लिए डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय द्वारा पीएचडी की उपाधि प्रदान की गई।
इसी प्रकार डॉ. आदम रज़ा को भी सोलापुर विश्वविद्यालय द्वारा आला हजरत के जीवन एवं सेवाओं पर किए गए शोध के लिए पीएचडी से सम्मानित किया गया।
उन्होंने कहा कि यह पूरे मराठवाड़ा के लिए गर्व का विषय है कि यहां के शोधकर्ताओं ने भी आला हजरत की इल्मी विरासत को दुनिया के सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 108वां उर्स-ए-आला हजरत,
नौजवानों से की भावुक अपील
अपने संबोधन के अंत में मौलाना गुलाम जिलानी मिस्बाही ने युवाओं से कहा कि आज समाज को केवल बड़ी-बड़ी डिग्रियों वाले नहीं, बल्कि अच्छे किरदार वाले नौजवानों की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि यदि नई पीढ़ी आला हजरत की ज़िंदगी से इल्म, अमल, सादगी, इंसानियत और इश्क़-ए-रसूल ﷺ का सबक सीख ले, तो समाज में नफ़रत की जगह मोहब्बत, बुराई की जगह अच्छाई और मायूसी की जगह उम्मीद का माहौल पैदा होगा।
उन्होंने कहा कि उर्स केवल एक वार्षिक आयोजन नहीं, बल्कि अपने बुज़ुर्गों की शिक्षाओं को याद करने, उनसे सीखने और अपने जीवन को बेहतर बनाने का अवसर है। यदि हम आला हजरत की पुस्तकों का अध्ययन करें, उनके विचारों को समझें और उनकी बताई राह पर चलें, तो समाज इल्म, अमन, भाईचारे और इंसानियत की नई मिसाल बन सकता है।
108वां उर्स-ए-आला हजरत: मुल्क में अमन-चैन और इंसानियत की भलाई के लिए हुई विशेष दुआ
कार्यक्रम के समापन पर मुल्क में अमन-चैन, आपसी भाईचारे, खुशहाली और पूरी इंसानियत की भलाई के लिए विशेष दुआ की गई। बड़ी संख्या में मौजूद अकीदतमंदों ने आला हजरत की तालीमात को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाने का संकल्प लिया।
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