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दिल्ली: 20 वर्षीय युवती पर नाबालिग लड़के के यौन उत्पीड़न का आरोप, हाईकोर्ट ने दी जमानत

Delhi POCSO Case Minor Boy Bail

दिल्ली में चौंकाने वाला मामला: 20 वर्षीय युवती पर नाबालिग लड़के के यौन उत्पीड़न का आरोप, हाईकोर्ट ने सख्त शर्तों के साथ दी जमानत

POCSO कानून के तहत दर्ज है मामला, अदालत ने कहा—जमानत का मतलब आरोपों से बरी होना नहीं; बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों में कानून सभी के लिए समान

नई दिल्ली | News Nation Online

देश की राजधानी दिल्ली से सामने आए एक संवेदनशील मामले ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि यौन अपराध केवल लड़कियों या महिलाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नाबालिग लड़के भी ऐसे अपराधों का शिकार हो सकते हैं। इसी संदर्भ में दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक 20 वर्षीय युवती को, जिस पर एक नाबालिग लड़के के यौन उत्पीड़न का आरोप है, कुछ कड़ी शर्तों के साथ नियमित जमानत प्रदान की है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत दिए जाने का अर्थ आरोपों से मुक्ति नहीं है और मामले की सुनवाई कानून के अनुसार जारी रहेगी। Delhi POCSO Case Minor Boy Bail.

यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि यह समाज में प्रचलित उस धारणा को चुनौती देता है कि यौन अपराधों में केवल महिलाएं या बालिकाएं ही पीड़ित होती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि POCSO (Protection of Children from Sexual Offences) Act पूरी तरह लिंग-तटस्थ (Gender Neutral) कानून है और यह प्रत्येक नाबालिग बच्चे—चाहे वह लड़का हो या लड़की—को समान कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है।


क्या है पूरा मामला?

प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह मामला दिल्ली के चाणक्यपुरी थाना क्षेत्र का है। आरोप है कि 20 वर्षीय युवती ने एक नाबालिग लड़के के साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए। घटना की जानकारी पीड़ित बालक की मां ने पुलिस नियंत्रण कक्ष (PCR) को दी, जिसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की।

जांच के दौरान पुलिस ने पीड़ित बालक का बयान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 183 के तहत दर्ज किया तथा अन्य साक्ष्यों को भी एकत्र कर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया।


किन धाराओं के तहत दर्ज हुआ मामला?

पुलिस ने आरोपी युवती के विरुद्ध—

  • भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 351(2) तथा
  • पॉक्सो (POCSO) अधिनियम, 2012 की धारा 6 और 8

के तहत मामला दर्ज किया है।

मामले की जांच अभी जारी है और आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्णय न्यायालय द्वारा साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा।


हाईकोर्ट में क्या हुई सुनवाई?

आरोपी युवती की नियमित जमानत याचिका पर दिल्ली उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति मनोज जैन की एकल पीठ ने सुनवाई की।

सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि—

  • आरोपी की आयु लगभग 20 वर्ष है।
  • वह साढ़े तीन महीने से अधिक समय से न्यायिक हिरासत में है।
  • उसके विरुद्ध पहले कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है।
  • जेल में उसका आचरण संतोषजनक रहा है।

सुनवाई के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित पीड़ित बालक की मां ने अदालत को बताया कि यदि आरोपी भविष्य में ऐसी किसी घटना की पुनरावृत्ति नहीं करती है तो उन्हें उसकी जमानत पर विशेष आपत्ति नहीं है। अदालत ने इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए नियमित जमानत देने का निर्णय लिया।


किन शर्तों पर मिली जमानत?

दिल्ली उच्च न्यायालय ने आरोपी युवती को ₹10,000 के निजी मुचलके और समान राशि के एक जमानतदार पर नियमित जमानत प्रदान की।

साथ ही अदालत ने कई महत्वपूर्ण शर्तें भी लगाईं—

  • आरोपी पीड़ित और उसके परिवार से किसी भी प्रकार का संपर्क नहीं करेगी।
  • उसे अपना वर्तमान निवास बदलना होगा।
  • किसी भी गवाह से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संपर्क नहीं करेगी।
  • अपना सक्रिय मोबाइल नंबर जांच अधिकारी को उपलब्ध कराएगी।
  • जांच और न्यायिक प्रक्रिया में पूरा सहयोग करेगी।
  • बिना अनुमति किसी भी प्रकार से पीड़ित परिवार को प्रभावित करने का प्रयास नहीं करेगी।

POCSO कानून क्या कहता है?

POCSO (Protection of Children from Sexual Offences) Act, 2012 भारत का एक विशेष कानून है, जिसे 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से बनाया गया है।

इस कानून की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह Gender Neutral है। अर्थात—

  • लड़का और लड़की दोनों समान रूप से कानून के संरक्षण में आते हैं।
  • पीड़ित का लिंग नहीं बल्कि उसकी आयु और अपराध की प्रकृति महत्वपूर्ण होती है।
  • प्रत्येक नाबालिग बच्चे को समान कानूनी अधिकार प्राप्त हैं।

विशेषज्ञों की राय

वरिष्ठ विधि विशेषज्ञ अधिवक्ता महेश एस. धन्नावत ने कहा कि समाज में लंबे समय से यह धारणा बनी हुई है कि यौन अपराधों के शिकार केवल लड़कियां या महिलाएं होती हैं, जबकि वास्तविकता इससे कहीं व्यापक है।

उन्होंने कहा—

“पॉक्सो कानून पूरी तरह लिंग-तटस्थ कानून है। इसका उद्देश्य प्रत्येक नाबालिग बच्चे को यौन शोषण से सुरक्षा देना है। लड़कों के साथ होने वाले यौन अपराध अक्सर सामाजिक संकोच के कारण सामने नहीं आ पाते। ऐसे मामलों में परिवारों को बिना डर के पुलिस और न्यायालय का सहयोग लेना चाहिए।”

उन्होंने आगे कहा कि बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों को किसी एक लिंग तक सीमित मानना उचित नहीं है। समाज को यह समझना होगा कि हर बच्चा समान सुरक्षा और न्याय का अधिकार रखता है।


अदालत का संदेश

दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि जमानत का अर्थ यह नहीं है कि आरोपी को दोषमुक्त घोषित कर दिया गया है। अदालत ने केवल जमानत याचिका पर उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर राहत प्रदान की है।

मामले की सुनवाई जारी रहेगी और अंतिम फैसला सभी साक्ष्यों, गवाहों और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही दिया जाएगा।


बच्चों की सुरक्षा क्यों है सबसे बड़ी जिम्मेदारी?

बाल अधिकार विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराधों की समय पर पहचान और शिकायत करना अत्यंत आवश्यक है।

यदि किसी बच्चे के व्यवहार में अचानक बदलाव दिखाई दे, डर, अवसाद, चुप्पी या असामान्य प्रतिक्रिया दिखाई दे तो अभिभावकों को तुरंत सतर्क होना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर पुलिस, चाइल्ड हेल्पलाइन या संबंधित अधिकारियों से संपर्क करना चाहिए।


निष्कर्ष

दिल्ली उच्च न्यायालय का यह मामला केवल एक जमानत आदेश नहीं, बल्कि समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश भी है कि बाल यौन उत्पीड़न किसी भी बच्चे के साथ हो सकता है और कानून सभी नाबालिगों को समान संरक्षण प्रदान करता है। ऐसे मामलों में संवेदनशीलता, निष्पक्ष जांच और समय पर न्याय ही बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का सबसे प्रभावी माध्यम है।



  • भारत सरकार – महिला एवं बाल विकास मंत्रालय: https://wcd.gov.in
  • राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR): https://ncpcr.gov.in
  • ई-कोर्ट्स (भारतीय न्यायपालिका): https://ecourts.gov.in
  • दिल्ली उच्च न्यायालय: https://delhihighcourt.nic.in

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