कर्नाटक हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: POCSO एक्ट जेंडर न्यूट्रल, महिला भी बन सकती है आरोपी
बेंगलुरु, 18 अगस्त: कर्नाटक हाईकोर्ट ने सोमवार को एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि पॉक्सो (POCSO) अधिनियम 2012 पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल है। अदालत ने कहा कि इस कानून का उद्देश्य केवल और केवल बच्चों की सुरक्षा है, और इसके दायरे से किसी भी आरोपी को केवल इसलिए बाहर नहीं किया जा सकता क्योंकि वह महिला है।
क्या है मामला?
यह मामला एक 52 वर्षीय महिला से जुड़ा है, जिसके खिलाफ एक नाबालिग लड़के के माता-पिता ने यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई थी। महिला ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी। उसकी दलील थी कि पॉक्सो अधिनियम का उद्देश्य मुख्य रूप से पुरुष आरोपियों को दंडित करना है और महिला आरोपी इस अधिनियम के तहत नहीं आ सकती।
न्यायालय की टिप्पणी
न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि “पॉक्सो एक्ट एक प्रगतिशील और कल्याणकारी कानून है। इसका मकसद बचपन की पवित्रता और बच्चों की गरिमा की रक्षा करना है। यह कानून बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए लाया गया है, न कि आरोपी के लिंग को ध्यान में रखकर। इसलिए यह अधिनियम जेंडर न्यूट्रल है।”
अदालत ने यह भी कहा कि बच्चे की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और चाहे अपराधी पुरुष हो या महिला, यदि उसने बच्चे के साथ यौन अपराध किया है तो उसे पॉक्सो एक्ट के तहत दंडित किया जाएगा।
पहले भी उठ चुका है सवाल
यह पहला मौका नहीं है जब इस मामले में अदालत का रुख स्पष्ट करने की आवश्यकता पड़ी हो। नवंबर 2024 में इस केस की सुनवाई के दौरान अदालत ने कार्यवाही पर रोक लगाई थी और पूछा था कि क्या वास्तव में महिला को पॉक्सो एक्ट के तहत आरोपी बनाया जा सकता है। उस समय न्यायालय ने इसे ‘अपने आप में अलग और असामान्य स्थिति’ बताया था और कहा था कि यह उनके सामने आया पहला मामला है जिसमें किसी महिला पर पॉक्सो का मामला दर्ज किया गया है।
पॉक्सो एक्ट का कानूनी पहलू
पॉक्सो अधिनियम 2012 बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए लाया गया विशेष कानून है। इस कानून की विशेषताएँ हैं:
- कानून बच्चे की उम्र, लिंग और आरोपी की पहचान से परे जाकर केवल बच्चे की सुरक्षा पर केंद्रित है।
- इसमें नाबालिग पीड़ितों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं जैसे कि बयान घर पर लेना, महिला पुलिस अधिकारी द्वारा बयान दर्ज करना, और पहचान उजागर करने पर पाबंदी।
- धारा 29 और 30 के तहत आरोपी पर दोषी होने की प्रारंभिक धारणा लागू होती है और उसे अपनी निर्दोषता साबित करनी होती है।
- मामलों की सुनवाई एक वर्ष के भीतर पूरी करने का प्रावधान है।
फैसले का महत्व
इस आदेश से यह स्पष्ट संदेश गया है कि पॉक्सो एक्ट सिर्फ पुरुषों पर लागू नहीं होता बल्कि महिलाएँ भी इसके तहत आरोपी बनाई जा सकती हैं। यह फैसला उन सभी मामलों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होगा, जहाँ महिला आरोपी के रूप में सामने आती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भारतीय न्यायपालिका की उस सोच को दर्शाता है जिसमें बच्चों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। इस फैसले के बाद यह तर्क अब टिक नहीं पाएगा कि महिला अपराधी होने पर पॉक्सो लागू नहीं किया जा सकता।
निष्कर्ष
कर्नाटक हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल इस विशेष मामले में महत्वपूर्ण है, बल्कि आने वाले समय में ऐसे कई मामलों के लिए मिसाल बनेगा। अदालत ने साफ किया है कि कानून का उद्देश्य आरोपी को नहीं बल्कि पीड़ित बच्चे की सुरक्षा को प्राथमिकता देना है।

