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50 साल बाद: सऊदी अरब ने कफाला सिस्टम खत्म किया — 1.3 करोड़ प्रवासी मजदूरों को मिली आज़ादी

50 साल बाद गुलामी की जंजीर टूटी — सऊदी अरब ने खत्म किया ‘कफाला सिस्टम’, 1.3 करोड़ प्रवासी मजदूरों को मिली आज़ादी

नई दिल्ली: कभी जिसने करोड़ों प्रवासी मजदूरों की ज़िन्दगी को जकड़ा रखा था, उस ‘कफाला सिस्टम’ को सऊदी अरब ने आधिकारिक रूप से समाप्त कर दिया है। 50 वर्षों तक चले इस सिस्टम के टूटने से अब लाखों लोगों की साँसों में राहत और उम्मीद की नयी किरण दिख रही है।

कफाला सिस्टम क्या था?

कफाला, यानी स्पॉन्सरशिप — नाम जितना सामान्य, हक़ीक़त उतनी ही क्रूर। इस व्यवस्था में किसी विदेशी मजदूर की वैधानिक स्थिति उसके नियोक्ता (कफील) से जुड़ी रहती थी। बिना कफील की अनुमति के काम बदलना, देश छोड़ना या न्याय की माँग करना मुमकिन नहीं था। इसी ने अनगिनत कामगारों को दबाया, अधीन किया और शोषण के दरवाज़े खोल दिए।

क्यों हुआ था यह लागू?

1950 के दशक में यह सिस्टम प्रशासनिक भार कम करने के उद्देश्य से अपनाया गया था — पर धीरे-धीरे यह ‘सेवा’ मजदूरों के लिये जंजीर बन गई। पासपोर्ट जब्त होना, वेतन न मिलना, अमानवीय रहने-काम करने की शर्तें — ये भारी वास्तविकताएँ बन गईं।

अब क्या बदला है?

जून 2025 के बाद हुए सुधारों के तहत सऊदी अरब ने कफाला सिस्टम को हटाकर कॉन्ट्रैक्ट-आधारित रोज़गार मॉडल अपनाया है। इसके अंतर्गत अब मजदूर बिना नियोक्ता की सहमति के नौकरी बदल सकेंगे, बिना एग्ज़िट वीज़ा के देश छोड़ सकेंगे और कानूनी सुरक्षा का अधिकार पा सकेंगे।

“अब हम गुलाम नहीं, इंसान हैं… अब हम अपने सपनों के मालिक हैं।” — एक प्रवासी मज़दूर

कितने लोग इससे जुड़े थे?

सऊदी अरब में लगभग 13.4 मिलियन विदेशी मजदूर कफाला के दायरे में थे — जो देश की जनसंख्या का लगभग 42% है। बड़े हिस्से बांग्लादेश, भारत, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका और फिलीपींस से थे। सबसे संवेदनशील वर्ग घरेलू कामगारों का है, जिनमें करोड़ों लोग हैं और जिन्हें पहले सबसे अधिक जोखिम झेलना पड़ता था।

अभियान की बड़ी उम्मीदें

कफाला के अंत से अनुमान है कि शोषण घटेगा, काम के हालात सुधरेंगे और मजदूरों को न्याय मिलने की संभावना बढ़ेगी। वे अब अपनी शर्तों पर बातचीत कर सकेंगे और आर्थिक गतिविधि में बेहतर भागीदारी कर पाएंगे — जो उनके और उनके परिवारों के लिए नई संभावनाएँ खोलता है।

एक युग का अंत, एक नई शुरुआत

50 सालों की पीड़ा के बाद यह फैसला सिर्फ एक कानूनी बदलाव नहीं — यह इंसानियत की एक छोटी परन्तु गहरी जीत है। उन हातों के लिये जो घरों और शहरों का निर्माण करते हैं, आज उनके लिये सम्मान और अधिकार की उम्मीद मजबूत हुई है।


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