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“आलिम की मौत, पूरे आलम की मौत होती है” अल्लामा मौलाना अब्दुल हमीद नूरी साहब को खिराज-ए-अकीदत

कंप्यूटर द्वारा तैयार हिंदी ऑडियो

“आलिम की मौत, पूरे आलम की मौत होती है”


हज़रत मुफ्ती-ए-आज़म-ए-हिंद के शागिर्द व मुरीद, उस्ताद-उल-उलेमा, सूफ़ी-बा-सफ़ा, हज़रत तबीब-ए-मिल्लत — अल्लामा मौलाना अब्दुल हमीद नूरी साहब (दामत बरकातुहुमुल आलिया) एक ऐसी नूरानी और गरिमामयी शख्सियत थे, जिनकी पूरी ज़िंदगी दीन-ए-इस्लाम की खिदमत, इबादत-ए-इलाही और सुन्नत-ए-मुस्तफ़ा ﷺ की पैरवी में बसर हुई। आप इल्म और अमल के ऐसे जामे थे, जिन्हें देखकर सलफ़-ए-सालिहीन की याद ताज़ा हो जाती थी।

आपकी शख्सियत में एक अजीब कशिश और रूहानी वकार था। जो भी एक बार आपकी सोहबत में बैठा, वह आपकी सादगी, मोहब्बत और दानाई का दीवाना हो गया।


इबादत और तक़वा

आपकी ज़िंदगी का हर लम्हा अल्लाह तआला की रज़ा के लिए वक्फ़ था। पाँच वक्त की नमाज़ बाजमाअत, नफ़्ल इबादतों का एहतिमाम और कसरत से रोज़े रखना — यह सब आपकी रूहानी ज़िंदगी के ऐसे स्तंभ थे, जो कभी न डिगे। आपकी इबादत में ऐसा खुशूअ और ख़ुज़ू होता था कि देखने वाला खुद भी अल्लाह की तरफ मुतवज्जेह हो जाता था। आपकी पेशानी पर सज्दों के निशान और चेहरे पर नूर-ए-इबादत की रौशनी — यही आपका असली तआरुफ था।


इल्म और तदरीस

इल्म के मैदान में आप एक बुलंद-पाया आलिम-ए-दीन थे। आपने न सिर्फ इल्म हासिल किया, बल्कि उसकी तालीम और इशाअत के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी लगा दी। आपने अल-जामिअतुल इस्लामिया रज़ा-उल-उलूम, कस्बा कनहवां, ज़िला सीतामढ़ी (बिहार) — जो आपका स्थायी मस्कन भी था — में लंबे अरसे तक तदरीसी खिदमत अंजाम दी।

आपके दरस और बयान हिकमत व दानाई से लबरेज़ होते थे। क़ुरआन और हदीस की रौशनी, सलफ़-ए-सालिहीन की झलक और आपका सादा मगर दिल में उतर जाने वाला अंदाज़-ए-बयान — यह सब मिलकर सुनने वालों के दिलों में इंक़लाब पैदा कर देते थे।


अख़लाक और किरदार

आप अख़लाक-ए-हसना के पैकर थे। तवाज़ो और इंकिसारी आपकी फितरत का हिस्सा थी। नरम लहजा, हुस्न-ए-सुलूक और ग़रीब-परवरी आपकी पहचान थी। आप ग़रीबों का सहारा और परेशानहाल लोगों के लिए उम्मीद की किरण थे। आपकी महफ़िल में बैठने वाला हर शख्स सुकून और रूहानी राहत लेकर उठता था।


आपकी जुदाई

आज आपका इंतकाल एक ऐसा गहरा घाव है, जिसकी टीस लंबे समय तक महसूस होती रहेगी। एक ऐसा चराग बुझ गया, जिसकी रौशनी से बेशुमार दिल रोशन थे। अहल-ए-इल्म, अहल-ए-दिल और आपके चाहने वाले आज गमगीन हैं — लेकिन आपकी तालीमात, आपके अक़वाल और आपका रोशन किरदार हमेशा ज़िंदा रहेगा और आने वाली नस्लों के लिए मशाल-ए-राह बनता रहेगा।

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दुआ

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त से दिल की गहराइयों से दुआ है कि — मरहूम की मुकम्मल मगफ़िरत फ़रमाए، उनके दर्जात बुलंद फ़रमाए، उनकी क़ब्र को जन्नत के बागों में से एक बाग बना दे، और उनके अहल-ए-ख़ाना، शागिर्दों، तलबा और तमाम मुहिब्बीन को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए।

آمین، بجاہ سید المرسلین ﷺ آمین


✍️ मुहम्मद इक़बाल मुस्तफ़ा अमजदी मुअल्लिम, दारुल उलूम कादरिया ग़ौसिया मरगिया चक, सीतामढ़ी (बिहार)


“वह चले गए, लेकिन उनका नूर बाकी है — उन दिलों में, जिन्हें उन्होंने रोशन किया।”

अल्लामा मौलाना अब्दुल हमीद नूरी साहब (दामत बरकातुहुमुल आलिया)
अल्लामा मौलाना अब्दुल हमीद नूरी साहब दामत बरकातुहुमुल आलिया

मौलाना अब्दुल हमीद नूरी साहब

https://newsnationonline.com/news/mufti-abdul-hameed-noori-intiqal-news


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Imran Siddiqui
Imran Siddiqui is a senior journalist and editor of NewsNationOnline, with over 17 years of experience covering news, politics, education and social issues in Maharashtra.