कामगारों पर अत्याचार की नई सक्ती — श्रमिक वर्ग के अधिकारों पर इतिहास का सबसे बड़ा हमला
— कॉमरेड सोहम प्रकाश बोदवडे
मराठवाड़ा सर्व श्रमिक संघटना, जालना
दिनांक 21 नवंबर 2025 भारतीय श्रमिक इतिहास का काला दिवस के रूप में याद किया जाएगा। इस दिन भारत सरकार ने चार नई श्रम संहिताएँ लागू कीं, जिन्हें कामगार संगठनों ने श्रमिकों के अधिकारों पर सबसे बड़ा हमला बताया है।
साल 2019 की शुरुआत में श्रम मंत्रालय द्वारा जारी आँकड़ों ने पिछले 45 वर्षों की सबसे अधिक बेरोजगारी का खुलासा किया। इसके तुरंत बाद मई 2019 में 17वीं लोकसभा चुनाव के बाद नई सरकार के गठन के साथ ही श्रम सुधारों की प्रक्रिया तेज हुई। जुलाई 2019 में पहली श्रम संहिता और सितंबर 2020 में शेष तीन संहिताएँ संसद में पेश की गईं और मात्र पाँच मिनट में पास भी हो गईं — वह भी तब, जब विपक्ष के कई सदस्य निलंबन के विरोध में सदन से बाहर थे।
कोरोना लॉकडाउन के दौरान जनता घरों में कैद थी, लेकिन इसी बीच करोड़ों कामगारों के भविष्य को तय करने वाले कानून बिना चर्चा और व्यापक सलाह-मशविरे के पास हो गए। यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक भावना के विपरीत कही गई।
राष्ट्रपति की मंजूरी सितंबर 2020 में ही मिल गई थी, लेकिन विधायी अधिसूचना राजनीतिक कारणों से रोककर रखी गई। बिहार चुनाव में बहुमत मिलते ही अचानक इन संहिताओं को लागू कर दिया गया। यह स्पष्ट संदेश था — सरकार की दिशा पूंजीवाद और श्रमिक अधिकारों के कमजोर होने की ओर है।
चार श्रम संहिताएँ — आधुनिक गुलामी का ढाँचा
इन संहिताओं का सार एक ही पंक्ति में समाया है — कामगारों के अधिकार घटाओ और मालिकों का अधिकार बढ़ाओ।
- पुराने 29 श्रम कानूनों को समाप्त कर सुरक्षा प्रावधान कमजोर किए गए।
- पूंजीपतियों को श्रमिकों पर पूरी तरह नियंत्रण की शक्ति दी गई।
- संगठन, हड़ताल और श्रमिक प्रतिरोध को कानूनी रूप से सीमित किया गया।
इन संहिताओं के दुष्परिणाम — सीधे कामगारों पर चोट
- स्थायी रोजगार का अंत — औद्योगिक संबंध संहिता के तहत 300 कर्मचारियों तक के संस्थानों को छंटनी के लिए सरकारी अनुमति की आवश्यकता नहीं; अर्थात मनमानी भर्ती और मनमानी छंटनी।
- हायर एंड फायर को कानूनी मान्यता — जब चाहो रखो, जब चाहो निकालो।
- यूनियन और हड़ताल पर कठोर प्रतिबंध — हड़ताल की प्रक्रिया इतनी कठिन कि व्यावहारिक रूप से हड़ताल करना अपराध जैसा बन गया।
- काम के घंटे 12 तक — ओवरटाइम के नियम नियोक्ता की सुविधा के अनुसार बदले जा सकते हैं, जिससे श्रमिकों पर भारी मानसिक व शारीरिक दबाव।
- लाखों श्रमिक कानून के दायरे से बाहर — छोटे उद्योग, वर्कशॉप और असंगठित क्षेत्र को सुरक्षा का लाभ लगभग नहीं।
- ESI, PF और ग्रेच्युटी अनिश्चित — इनका भविष्य नोटिफिकेशन पर निर्भर, यानी कभी भी बदला/समाप्त किया जा सकता है।
- OSH कोड में सुरक्षा निरीक्षण सीमित — निरीक्षण ऑनलाइन और पूर्व-स्वीकृति आधारित, शोषण की जाँच कौन करेगा?
- वेतन संरचना में बदलाव — बेसिक वेतन घटाकर PF और ESI की हिस्सेदारी कम करने की जमीन तैयार, जिससे भविष्य असुरक्षित।
- गिग और असंगठित कामगारों का केवल नाम मात्र शामिल — न योजना स्पष्ट, न बजट, न क्रियान्वयन।
दुनिया आगे बढ़ी — भारत पीछे जा रहा है
विकसित देशों ने श्रमिकों पर भार कम करके उत्पादकता बढ़ाने का मॉडल अपनाया है। यह अंतर नीचे तालिका में स्पष्ट है:
| देश | साप्ताहिक कार्य समय | परिणाम |
|---|---|---|
| नीदरलैंड | 32.2 घंटे | कम काम लेकिन स्थिर आय और उच्च उत्पादकता |
| आइसलैंड | 35–36 घंटे | तनाव में कमी, अर्थव्यवस्था मजबूत |
| माइक्रोसॉफ्ट जापान (2019) | चार दिन कार्य सप्ताह | उत्पादकता 40% तक बढ़ी |
जब दुनिया श्रमिक कल्याण और कम कार्य समय को प्रगति का साधन मानती है, तब भारत में श्रमिकों पर 12 घंटे की कार्य व्यवस्था और अस्थिर रोजगार थोपना उन्हें 19वीं शताब्दी की औद्योगिक दमनकारी व्यवस्था में वापस धकेलने जैसा है।
क्यों कहा जा रहा है — “Ease of Doing Business नहीं, Ease of Exploiting Workers”
- पूंजीपतियों के मुनाफे में वृद्धि
- कामगारों की सौदेबाजी शक्ति समाप्त
- यूनियनों को कमजोर बनाना
- न्यायिक लड़ाई को व्यावहारिक रूप से असंभव बनाना
- कौन स्थिर और सुरक्षित नौकरी — कोई गारंटी नहीं
- कामगारों में भय और असुरक्षा बनाए रखना
26 नवंबर 2025 — ऐतिहासिक राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन
कामगार संगठनों ने इसे सिर्फ विरोध नहीं बल्कि अस्तित्व की लड़ाई बताया है। आंदोलन की रणनीति:
- सभी कारखानों और मजदूर बस्तियों में जागरूकता अभियान
- एकजुट और संघर्ष-प्रधान यूनियनों का निर्माण
- प्रतीकात्मक विरोध नहीं — निर्णायक आंदोलन
- देशव्यापी संघर्ष और सामूहिक लामबंदी
- आवश्यकता पड़ने पर अनिश्चितकालीन हड़ताल
निष्कर्ष
चार श्रम संहिताएँ केवल कानून नहीं — यह कामगारों के दशकों के संघर्ष से प्राप्त अधिकारों को मिटाने की गहरी रणनीति है। यही कारण है कि देशभर के कामगार एकस्वर से कहते हैं कि यह संघर्ष केवल कानूनों के खिलाफ नहीं, बल्कि अस्तित्व, सम्मान और भविष्य की रक्षा के लिए है।
कामगार विरोधी चार श्रम संहिताओं का धिक्कार!!!
— कॉमरेड सोहम प्रकाश बोदवडे
मराठवाड़ा सर्व श्रमिक संघटना, जालना

Discover more from NewsNation Online
Subscribe to get the latest posts sent to your email.



































































































Leave a Reply