⚖️ सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: अब प्रोजेक्ट लागत के आधार पर तय होगा पर्यावरण जुर्माना, बिल्डर्स को कड़ा संदेश Environmental Compensation Supreme Court India
नई दिल्ली/पुणे | विशेष संवाददाता | NewsNationOnline
पर्यावरण नियमों का उल्लंघन कर बड़े निर्माण प्रोजेक्ट खड़े करने वाले बिल्डर्स के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। एक महत्वपूर्ण फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया है कि पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई तय करने के लिए प्रोजेक्ट की कुल लागत या टर्नओवर को आधार बनाया जा सकता है।
साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि National Green Tribunal (NGT) को इस आधार पर भारी जुर्माना लगाने का पूरा अधिकार है। (SCC Online)
🏗️ पुणे की कंपनियों को झटका, याचिकाएं खारिज
यह फैसला पुणे की दो रियल एस्टेट कंपनियों — रिदम काउंटी और की स्टोन प्रॉपर्टीज — की याचिकाएं खारिज करते हुए दिया गया।
इन कंपनियों पर आरोप था कि उन्होंने आवश्यक पर्यावरणीय मंजूरी के बिना या नियमों का उल्लंघन करते हुए निर्माण कार्य किया।
स्थानीय निवासियों की शिकायत पर NGT ने जांच कर:
- रिदम काउंटी पर ₹5 करोड़
- की स्टोन प्रॉपर्टीज पर ₹4.47 करोड़
का जुर्माना लगाया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया। (SCC Online)
⚖️ कोर्ट ने कहा: “बड़ा प्रोजेक्ट, बड़ी जिम्मेदारी”
सुप्रीम कोर्ट की पीठ (न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई) ने अपने फैसले में स्पष्ट किया:
- प्रोजेक्ट जितना बड़ा होगा, पर्यावरण पर प्रभाव भी उतना अधिक होगा
- बड़े प्रोजेक्ट से अधिक मुनाफा कमाने वाले डेवलपर्स की जिम्मेदारी भी अधिक होगी
- इसलिए प्रोजेक्ट लागत या टर्नओवर को आधार बनाना पूरी तरह उचित है
अदालत ने यह भी कहा कि कोई तय फॉर्मूला न होने के बावजूद NGT को मुआवजा तय करने का अधिकार है। (CAalley)
📊 ‘Polluter Pays’ सिद्धांत को मिली मजबूती
सुप्रीम कोर्ट ने ‘Polluter Pays Principle’ को दोहराते हुए कहा कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वालों को उसकी भरपाई करनी ही होगी।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पहले के मामलों में प्रोजेक्ट लागत का 5% तक जुर्माना लगाया गया है, लेकिन यह कोई तय सीमा नहीं है—स्थिति के अनुसार अधिक भी हो सकता है। (Hindustan Times)
📈 जुर्माना उचित और संतुलित: कोर्ट
अदालत ने पाया कि:
- ₹335 करोड़ के प्रोजेक्ट पर ₹5 करोड़ (लगभग 1.49%)
- ₹76 करोड़ के प्रोजेक्ट पर ₹4.47 करोड़ (लगभग 5.88%)
का जुर्माना न तो मनमाना है और न ही अत्यधिक, बल्कि पूरी तरह न्यायसंगत है। (SCC Online)
⏳ 3 महीने में भुगतान का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों कंपनियों की अपील खारिज करते हुए NGT के आदेश को बरकरार रखा और जुर्माना जमा करने के लिए तीन महीने की समयसीमा तय की है।
📌 अन्य बिल्डर्स के लिए चेतावनी
यह फैसला देशभर के बिल्डर्स और डेवलपर्स के लिए स्पष्ट संदेश है कि:
👉 पर्यावरण नियमों की अनदेखी अब महंगी पड़ेगी
👉 प्रोजेक्ट जितना बड़ा, उतना बड़ा जुर्माना
👉 बिना अनुमति निर्माण पर कड़ी कार्रवाई तय
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👉 निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। इससे न केवल ‘प्रदूषक भुगतान करेगा’ सिद्धांत को मजबूती मिली है, बल्कि निर्माण क्षेत्र में जवाबदेही भी तय हुई है।
आने वाले समय में यह निर्णय देशभर में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित होगा।
Environmental Compensation Supreme Court India

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