आरएसएस की आलोचना धर्म-विरोधी नहीं: एडवोकेट महेश धन्नावत का कानूनी विश्लेषण
जालना: कर्नाटक उच्च न्यायालय के एक अहम फैसले ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और ‘हिंदू’ शब्द के उपयोग को लेकर देशव्यापी कानूनी बहस को जन्म दिया है। मुख्यमंत्री सिद्धरामैया के खिलाफ दर्ज शिकायत खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि आरएसएस ‘हिंदू’ शब्द का प्रयोग धर्म के रूप में नहीं करता; इसलिए संगठन की आलोचना को धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला तर्क नहीं माना जा सकता।
नोटरी एसोसिएशन के कार्याध्यक्ष एडवोकेट महेश एस. धन्नावत ने इस निर्णय पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह फैसला भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 356(2) के अंतर्गत मानहानि के घटकों को स्पष्ट करता है।
मानहानि सिद्ध करने के आवश्यक तत्व — धन्नावत का विश्लेषण
- आरोपी का स्पष्ट और दुर्भावनापूर्ण इरादा।
- पीड़ित व्यक्ति की सटीक पहचान और उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने का उद्देश्य।
धन्नावत ने बताया कि मुख्यमंत्री का वक्तव्य विधानसभा चर्चा के दौरान दिया गया था और उसका उद्देश्य किसी व्यक्ति या संस्था की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाना नहीं था, बल्कि सरकारी कार्यों व कानून-व्यवस्था पर प्रकाश डालना था।
न्यायालय का निष्कर्ष — आरएसएस पर टिप्पणी धर्म-विरोधी नहीं
याचिकाकर्ता द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों में आरएसएस की आधिकारिक जानकारी का हवाला देते हुए अदालत ने यह माना कि संगठन ‘हिंदू’ को धर्म के रूप में परिभाषित नहीं करता। इसलिए, अदालत ने कहा कि आरएसएस पर उठाई गई टिप्पणी किसी धर्म या धार्मिक विश्वास का अपमान नहीं ठहरती।
धन्नावत ने यह भी कहा कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 299 के अनुसार धार्मिक भावनाओं का उल्लंघन तभी अपराध बनता है जब जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से किसी धर्म का अपमान किया गया हो — जो इस मामले में सिद्ध नहीं हुआ।
बेंगलुरु के अतिरिक्त मुख्य न्यायदंडाधिकारी के.एन. शिवकुमार ने कहा कि शिकायत में प्रस्तुत आरोप और संलग्न दस्तावेज प्रथमदृष्टया किसी अपराध की पूर्ति नहीं करते। शिकायत धारा 223 के अंतर्गत दर्ज करायी गयी थी, पर अदालत ने कहा कि मानहानि का मुकदमा वही कर सकता है जो प्रत्यक्ष रूप से क्षतिग्रस्त हुआ हो।
निष्कर्ष
यह निर्णय मानहानि और धार्मिक भावनाओं के दायरे को स्पष्ट करता है और भविष्य में ऐसे मामलों के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है।

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