वृद्ध पिता को बेघर करने वाले बेटे को हाईकोर्ट की कड़ी फटकार; हड़पी हुई संपत्ति वापस दिलाई
मुंबई/जालना: भारतीय संस्कृति में माता-पिता के सम्मान को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है, लेकिन इसी परंपरा के विपरीत एक बेटे ने अपने ही वृद्ध पिता को घर से निकाल दिया। इस गंभीर मामले में मुंबई उच्च न्यायालय ने कड़ा फैसला सुनाते हुए बेटे के नाम किया गया गिफ्ट डीड रद्द कर दिया और संपत्ति पुनः पिता को वापस सौंपने का आदेश दिया। यह निर्णय उन सभी लोगों के लिए स्पष्ट चेतावनी है जो माता-पिता की उपेक्षा कर उनकी संपत्ति हड़पने का प्रयास करते हैं।
विदुर नीति में कहा गया है— “जहां बुजुर्गों का सम्मान नहीं होता और उन्हें कष्ट दिया जाता है, वहां लक्ष्मी का वास नहीं होता और वह घर नष्ट हो जाता है।” हाईकोर्ट का यह निर्णय इसी सिद्धांत की न्यायिक पुष्टि जैसा है।
मामले की पृष्ठभूमि
86 वर्षीय राम स्वरूप सोधानी ने बीमारी और कमजोरी के दौरान अपना मुंबई स्थित फ्लैट बेटे रविप्रकाश सोधानी और नाती के नाम गिफ्ट डीड के माध्यम से हस्तांतरित कर दिया था। उस समय वे गले के कैंसर के संदेह से गुजर रहे थे और शारीरिक व मानसिक रूप से काफी कमजोर थे।
- बुजुर्ग पिता को प्रताड़ित किया गया
- उन्हें एक कमरे में बंद कर दिया गया
- उनके बैंक खाते से पैसे निकाले गए
- उनकी मूल आवश्यकताओं की अनदेखी की गई
इन प्रताड़नाओं से तंग आकर वृद्ध पिता ने ‘मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल’ में शिकायत दर्ज कराई। ट्रिब्यूनल ने गिफ्ट डीड को अवैध मानते हुए रद्द कर दिया। बेटे ने इस आदेश के खिलाफ अपील की, लेकिन अपीलीय प्राधिकरण और बाद में मुंबई उच्च न्यायालय—दोनों ने उसके पक्ष में कोई राहत नहीं दी।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
“माता-पिता जब अपनी संपत्ति संतानों को देते हैं, तो उनकी देखभाल की अपेक्षा स्वाभाविक रूप से उससे जुड़ी होती है। इसका लिखित रूप में उल्लेख आवश्यक नहीं है। देखभाल न करने की स्थिति में ऐसा हस्तांतरण अवैध माना जाएगा।”
— मुंबई उच्च न्यायालय
अदालत का यह निर्णय उन सभी वृद्ध नागरिकों के लिए बड़ी राहत है जो अपने बच्चों द्वारा प्रताड़ित या उपेक्षित किए जाते हैं। कोर्ट ने बेटे को तुरंत घर खाली करने का आदेश दिया।
नोटरी एसोसिएशन जालना की प्रतिक्रिया
नोटरी एसोसिएशन, जालना के कार्याध्यक्ष एडवोकेट महेश एस. धन्नावत ने इस फैसले को समाज के लिए मार्गदर्शक बताते हुए कहा कि कई मामलों में संतानें प्रेम का दिखावा कर संपत्ति अपने नाम करा लेती हैं और बाद में माता-पिता को बेसहारा छोड़ देती हैं।
“ज्येष्ठ नागरिक कानून 2007 बुजुर्गों के लिए एक सशक्त कानूनी हथियार है। यदि संतान माता-पिता की देखभाल नहीं करती, तो संपत्ति का हस्तांतरण स्वतः अवैध माना जा सकता है।”
— एडवोकेट महेश एस. धन्नावत
उन्होंने यह भी कहा कि भारत में नए कानून, जैसे कि भारतीय न्याय संहिता लागू हो रहे हैं, इसलिए नागरिकों के लिए कानून की जानकारी अनिवार्य होती जा रही है।
भारतीय संस्कृति का संदर्भ
भारतीय इतिहास में माता-पिता की सेवा सर्वोच्च मानी गई है। श्रवण कुमार ने अंधे माता-पिता को कंधों पर बैठाकर तीर्थयात्रा कराई, जबकि पुरु ने राजा ययाति को अपना तारुण्य सौंपने में क्षणभर भी नहीं लगाया।
इसके विपरीत आज कुछ लोग माता-पिता की संपत्ति हथियाकर उन्हें घर से बाहर निकाल देते हैं। हाईकोर्ट का यह निर्णय ऐसे सभी व्यवहारों पर कठोर संदेश है और समाज के लिए चेतावनी भी।
समाज के लिए बड़ा संदेश
यह फैसला स्पष्ट रूप से बताता है कि कानून की नजर में रक्त संबंध नहीं, बल्कि कर्तव्य, संवेदनशीलता और मानवता सर्वोपरि है।

Dhannawat Law Associates
Adv. Mahesh S. Dhannawat
B.Com, LL.M, G.D.C. & A.
Ex-Vice President, Jalna District Bar Association
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