हमारे बच्चों का भविष्य खतरे में—भारत को अभी चाहिए ग्रीन स्कूल क्रांति!
भारत को चाहिए राष्ट्रीय ‘ग्रीन स्कूल’ मिशन: अधिवक्ता महेश एस. धन्नावत का प्रधानमंत्री मोदी से सार्थक अनुरोध
उप-शीर्षक: जलवायु शिक्षा अब विकल्प नहीं, संवैधानिक कर्तव्य है; ‘क्लीनिकल क्लाइमेट एजुकेशन’ मॉडल से बदल सकती है देश की शिक्षा व्यवस्था।
नई दिल्ली/जालना, प्रतिनिधि — जैसे-जैसे विश्व समुदाय COP-30 के करीब पहुंच रहा है, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण को लेकर गंभीरता तेजी से बढ़ रही है। इस वैश्विक परिस्थिति में भारत को शिक्षा में पर्यावरणीय चेतना को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। इसी संदर्भ में प्रख्यात विधिवेत्ता अधिवक्ता महेश एस. धन्नावत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पूरे देश में राष्ट्रीय ‘ग्रीन स्कूल मिशन’ लागू करने की अपील की है। उनका कहना है कि यह केवल एक पर्यावरणीय पहल नहीं, बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों के स्वस्थ जीवन के मौलिक अधिकार को सशक्त बनाने का माध्यम है।
अधिवक्ता धन्नावत ने कहा—
“ओमान का ग्रीन स्कूल मॉडल स्पष्ट करता है कि जलवायु शिक्षा को अनुभव-आधारित और परिवर्तनकारी कैसे बनाया जा सकता है। भारत को भी ‘क्लीनिकल क्लाइमेट एजुकेशन’ अपनाना चाहिए, ताकि स्कूल स्थिरता की जीवंत प्रयोगशाला बन सकें।”
क्या है ‘क्लीनिकल क्लाइमेट एजुकेशन’?
यह मॉडल “करके सीखना” (Learning by Doing) के सिद्धांत पर आधारित है। इसमें छात्र केवल किताबों से नहीं, बल्कि वास्तविक पर्यावरणीय गतिविधियों में शामिल होकर सीखते हैं, जैसे—
- प्लास्टिक वेस्ट और रीसाइक्लिंग प्रबंधन
- ऊर्जा उपयोग का विश्लेषण और ऊर्जा बचत अभियान
- वर्षा जल संचयन और जल संरक्षण प्रथाएं
- जैव विविधता संरक्षण गतिविधियाँ
- विद्यालय परिसर का पर्यावरण ऑडिट
इससे स्कूल एक लिविंग क्लाइमेट लैब बन जाते हैं, जहां सिद्धांत का सीधा उपयोग व्यवहार में दिखाई देता है।
भारतीय संविधान और पर्यावरणीय न्याय: ‘ग्रीन स्कूल’ क्यों अनिवार्य?
अधिवक्ता धन्नावत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक निर्णय बताते हैं कि पर्यावरण संरक्षण नागरिकों का मौलिक अधिकार है और राज्य व समाज का दायित्व भी। उन्होंने प्रमुख निर्णयों का उल्लेख किया—
- एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (1987) — स्वस्थ और प्रदूषण मुक्त वातावरण का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा।
- वेल्लोर सिटिज़न्स वेलफेयर फोरम (1996) — ‘प्रदूषक भुगतान सिद्धांत’ और ‘एहतियाती सिद्धांत’ भारतीय कानून का हिस्सा।
- इंडियन काउंसिल फॉर एनवायरो-लीगल एक्शन (1996) — उद्योगों को पर्यावरणीय क्षति की भरपाई की जिम्मेदारी दी गई।
- एम.के. रणजीत सिंह बनाम भारत संघ (2024) — सुप्रीम कोर्ट ने कहा: “जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से मुक्त रहने का अधिकार मौलिक अधिकार है।”
- सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य (1991) — स्वच्छ हवा और पानी का अधिकार — अनुच्छेद 21 का हिस्सा।
इन सभी निर्णयों से स्पष्ट है कि स्कूलों को सुरक्षित, हरित और टिकाऊ बनाना राज्य की मूल जिम्मेदारी है।
अधिवक्ता धन्नावत का सुझाव: राष्ट्रीय ‘ग्रीन स्कूल मिशन’ के चार प्रमुख स्तंभ
- जलवायु शिक्षा का पाठ्यक्रम में एकीकरण — जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण नियंत्रण और स्थिरता को मुख्य पाठ्यक्रम का स्थायी हिस्सा बनाना।
- शिक्षक प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण — शिक्षकों को व्यावहारिक, मूल्य-आधारित और अंतःविषय जलवायु शिक्षा देने के लिए प्रशिक्षित करना।
- राष्ट्रीय ग्रीन स्कूल प्रमाणन प्रणाली — यूनेस्को मानकों पर आधारित मानकीकृत प्रमाणन प्रणाली।
- सामुदायिक सहभागिता और सार्वजनिक-निजी सहयोग — स्कूलों, पंचायतों, नगर पालिका और उद्योगों की संयुक्त पर्यावरणीय परियोजनाएँ।
भारत के लिए प्रेरणा: ओमान का मॉडल
ओमान ने अपनी GSS (Green School Standard) प्रणाली को UNESCO मानकों से जोड़कर दुनिया के सामने एक सफल उदाहरण स्थापित किया है। भारत अपनी विशाल युवा आबादी और बढ़ती पर्यावरणीय चुनौतियों के कारण इस मॉडल को अपनाकर वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभा सकता है।
निष्कर्ष
“भारत के स्कूल केवल पढ़ाई की जगह नहीं, बल्कि पर्यावरणीय नेतृत्व के केंद्र बन सकते हैं। ग्रीन स्कूल मिशन न सिर्फ शिक्षा को बदलेगा, बल्कि हमारे बच्चों और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित करेगा।”
अधिवक्ता धन्नावत कहते हैं—
“यह सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि संविधान और मानवता—दोनों के प्रति हमारी नैतिक जिम्मेदारी है।”
— NewsNationOnline Team

