लिव-इन संबंध को मिली सुरक्षा, लेकिन पहली पत्नी के अधिकार पर सवाल — एडवोकेट महेश धन्नावत की भावुक अपील: “आत्मनिर्भर बनें, अपने ‘कृष्ण’ खुद बनें”
पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के हालिया फैसले ने समाज और कानूनी जगत में एक नई बहस छेड़ दी है। एक विवाहित महिला, जो अपने पति और बच्चे को छोड़कर प्रेमी के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही थी, उसे अदालत ने जीवन सुरक्षा प्रदान की है। नोटरी एसोसिएशन के कार्याध्यक्ष एडवोकेट महेश एस. धन्नावत ने इस निर्णय को संविधान के अनुरूप बताया, लेकिन साथ ही एक अहम प्रश्न उठाया — “इसमें पहली पत्नी और बच्चों के अधिकारों की रक्षा कैसे होगी?”
एड. धन्नावत ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हक देता है। इसलिए भले ही संबंध सामाजिक रूप से मान्य हों या न हों, यदि किसी व्यक्ति को जान का खतरा हो तो अदालत सुरक्षा देने के लिए बाध्य है।
हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत ने इस लिव-इन संबंध को कानूनी मान्यता नहीं दी है। फैसले के पैराग्राफ 17 में साफ कहा गया है कि पीड़ित पति — तलाक, भरण-पोषण और बच्चे की कस्टडी जैसे मामलों में — अपनी कानूनी लड़ाई जारी रख सकता है।
महाभारत का उदाहरण देते हुए एड. धन्नावत ने कहा —
“द्रौपदी का वस्त्रहरण सभा में होता रहा, और पाँचों पति असहाय थे। आज भी कई महिलाएं आर्थिक रूप से पति पर निर्भर रहती हैं। लेकिन जब वही पति छोड़ जाता है, तो महिला खुद को द्रौपदी की तरह असुरक्षित और अकेला पाती है।”
उन्होंने महिलाओं से भावुक अपील की —
“अब समय आ गया है कि हर महिला अपने ‘कृष्ण’ स्वयं बने — शिक्षा, आर्थिक स्वावलंबन और कानूनी जागरूकता ही आपकी सबसे बड़ी ताकत है।”
एड. धन्नावत ने कहा कि कानून केवल किसी व्यक्ति के जीवन की रक्षा कर सकता है, लेकिन सम्मान, सुरक्षा और भविष्य की स्थिरता आत्मनिर्भरता से ही मिलती है।
उनके अनुसार यह फैसला समाज को, विशेष रूप से महिलाओं को, एक महत्वपूर्ण संदेश देता है — कि किसी भी प्रकार की निर्भरता या असुरक्षा से बचने का सबसे प्रभावी उपाय है खुद को सक्षम, शिक्षित और अपने अधिकारों के प्रति सजग बनाना।

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