कुरान और अहले-बैत से जुड़ाव ही इंसानियत की सच्ची राह — अल्लामा सैयद अब्दुर्रब मखदूमी
ताजदार-ए-बगदाद कॉन्फ्रेंस व जलसा-ए-दस्तार-ए-हिफ़्ज़ संपन्न
जालना।
“कुरान और अहले-बैत से मज़बूती से जुड़ना ही इंसानियत की सच्ची राह है और यही दुनिया व आख़िरत की कामयाबी की ज़मानत है।” यह विचार ख़ानक़ाहों फिरदौसिया, मख़दूमिया, सुभ्हानिया, बलहरी शरीफ़ (अयोध्या–फ़ैज़ाबाद, उत्तर प्रदेश) के सज्जादा नशीन, आले-रसूल औलाद-ए-अली अल्लामा सैयद अब्दुर्रब मखदूमी (अलमारूफ़ “चाँद बाबू”) ने जालना में आयोजित ताजदार-ए-बगदाद कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उम्मत को स्पष्ट संदेश दिया है कि कुरान और अहले-बैत को थामे रखना ही सीधी राह पर क़ायम रहने का सबसे विश्वसनीय ज़रिया है।
जालना में भव्य दीनी आयोजन, देशभर से जुटे उलेमा और अकीदतमंद
जालना शहर के खरपुडी रोड स्थित दारुल उलूम रजविया लतीफिया मिसबाहुल उलूम के तत्वावधान में शनिवार, 24 जनवरी को ताजदार-ए-बगदाद कॉन्फ्रेंस एवं जलसा-ए-दस्तार-ए-हिफ़्ज़ मज़हबी अनुशासन, उत्साह और रूहानी वातावरण में भव्य रूप से संपन्न हुआ। इस अवसर पर देश के विभिन्न राज्यों से पधारे उलेमा-ए-किराम, मशाइख और बड़ी संख्या में अकीदतमंदों की मौजूदगी ने आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान की।
इस दीनी आयोजन की सरपरस्ती रज़ा अकादमी के मराठवाड़ा अध्यक्ष सैय्यद जमील मौलाना ने की। कार्यक्रम के मुख्य आयोजक दारुल उलूम के नाज़िम मौलाना गुलाम जिलानी मिस्बाही रहे। प्रमुख अतिथियों में मुंबई के मुफ्ती खलील अहमद, उत्तर प्रदेश के मौलाना सईद अहमद तथा मुंब्रा के मौलाना महमूद अली सुभानी सहित अनेक वरिष्ठ उलेमा-ए-किराम शामिल हुए।
कुरान और अहले-बैत से जुड़कर ही समाज में अमन व इंसाफ़ संभव
अपने विस्तारपूर्ण संबोधन में अल्लामा मख़दूमी ने कहा कि अहले-बैत से मुराद हज़रत अली, हज़रत फ़ातिमा, हज़रत हसन और हज़रत हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हुम) हैं। कुरान और अहले-बैत इस्लाम की वह अमानत हैं, जिनसे जुड़कर इंसान सिरात-ए-मुस्तकीम पर क़ायम रहता है और समाज में अमन, इंसाफ़ व इंसानियत की बुनियाद मज़बूत होती है।
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि कुरान से जुड़ाव केवल उसे अपने पास रखने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे पढ़ना, समझना, सुनना और दूसरों तक पहुँचाना भी उतना ही ज़रूरी है। कुरान इंसान के चरित्र को संवारता है और उसे सच्चाई, न्याय व परहेज़गारी का मार्ग दिखाता है, जबकि अहले-बैत की मोहब्बत और उनकी शिक्षाओं पर अमल सब्र, त्याग और इंसानियत का पैग़ाम देता है।

दो हज़ार से अधिक लोगों की सहभागिता, दस्तारबंदी व सम्मान समारोह
कॉन्फ्रेंस में लगभग दो हज़ार से अधिक लोगों की सहभागिता रही। जलसे के दौरान दीन, अख़लाक़, समाज-सुधार, आपसी भाईचारे और उम्मत की एकता जैसे विषयों पर प्रभावशाली तक़रीरें हुईं। मग़रिब की नमाज़ के बाद लंगर-ए-आम का आयोजन भी किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में अकीदतमंदों ने भाग लिया।
जलसा-ए-दस्तार-ए-हिफ़्ज़ के अवसर पर दारुल उलूम के हाफ़िज़ छात्रों—हाफ़िज़ आज़ाद रज़ा, हाफ़िज़ सुफ़ियान रज़ा, हाफ़िज़ हसनैन रज़ा, हाफ़िज़ शाहनवाज़ अहमद, हाफ़िज़ अली हसन और हाफ़िज़ मोहम्मद तौसीफ़—की दस्तारबंदी कर उन्हें प्रमाणपत्र प्रदान किए गए। साथ ही मदरसे में सेवाएँ दे रहे उस्ताद हाफ़िज़ मोहम्मद रिज़वान, मौलाना ज़ियाउर्रहमान, हाफ़िज़ फ़य्याज़ आलम, हाफ़िज़ तसव्वुर रज़ा और हाफ़िज़ मुबारक हुसैन को भी सम्मानित किया गया।

छात्र मोहम्मद नफीसुज्जमा का प्रभावशाली अंग्रेज़ी भाषण बना आकर्षण
कार्यक्रम के दौरान मदरसे के नाज़िम मौलाना गुलाम जिलानी मिस्बाही के पुत्र, कक्षा 11वीं के छात्र मोहम्मद नफीसुज्जमा ने अंग्रेज़ी भाषा में कुरान और हाफ़िज़-ए-कुरान की अज़मत पर विचार रखे। उनके आत्मविश्वासपूर्ण और वैचारिक भाषण ने पूरे जलसागाह में नई ऊर्जा और बौद्धिक चेतना का संचार कर दिया।
उन्होंने कहा कि कुरान की सही अज़मत को समझने के लिए उस दौर को समझना ज़रूरी है, जब यह पाक कलाम नाज़िल हुआ था। जहालत के उस समय का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि किस तरह समाज में अमानवीय कुप्रथाएँ प्रचलित थीं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि इंसानों द्वारा लिखी गई किताबों में ग़लतियाँ हो सकती हैं, लेकिन अल्लाह के कलाम—कुरान—में कोई त्रुटि नहीं है और पिछले 1400 वर्षों से इसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है।
वर्तमान समाज की विडंबनाओं पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि कुरान झूठ से मना करता है, फिर भी झूठ आम होता जा रहा है; कुरान सूद से रोकता है, फिर भी ब्याज का चलन बढ़ रहा है; कुरान एकता का संदेश देता है, लेकिन हम आपसी मतभेदों में बँटते जा रहे हैं। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि कुरान को केवल रटने के बजाय, उसे समझकर अपनी ज़िंदगी का मार्गदर्शन बनाना ही उसकी सच्ची इज़्ज़त है।

अमन-शांति की दुआ के साथ आयोजन का समापन
समापन पर सामूहिक दुआ कराई गई, जिसमें देश में अमन-शांति, आपसी भाईचारे, तरक़्क़ी और मुसलमानों की सलामती की दुआ माँगी गई। अंत में आयोजन समिति और स्थानीय ज़िम्मेदारों ने जालना शहरवासियों, आसपास के क्षेत्रों के नागरिकों और बाहर से आए तमाम उलेमा-ए-किराम का आभार व्यक्त किया। आम लोगों के सहयोग और दुआओं से यह दीनी कॉन्फ्रेंस एवं जलसा-ए-दस्तार-ए-हिफ़्ज़ सफल, यादगार और प्रेरणादायी सिद्ध हुआ।

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