8 साल के हाशीम खान का पहला रोजा, परिवार में खुशी और फख्र का माहौल
जालना | संवाददाता
जालना शहर की सईद अली कॉलोनी में रहने वाले 8 वर्षीय हाशीम खान (पुत्र हारीस खान पठान) ने अपनी जिंदगी का पहला रोजा रखकर परिवार और समाज में एक प्रेरणादायक मिसाल पेश की है। इतनी कम उम्र में रोजा रखने को लेकर घर में खुशी और गर्व का माहौल देखने को मिला।
परिवार के सदस्यों के अनुसार, हाशीम ने पूरे दिन बड़े धैर्य और अनुशासन के साथ रोजा रखा और इफ्तार तक इसे सफलतापूर्वक पूरा किया। इस उपलब्धि पर परिवार, रिश्तेदारों और मोहल्ले के लोगों ने उसे मुबारकबाद दी।
हाशीम के दादा खुद्दूस खान ने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि छोटी उम्र में रोजा रखना आसान नहीं होता, लेकिन हाशीम ने इसे पूरी लगन और समझदारी के साथ निभाया। उन्होंने उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए दुआ करते हुए कहा कि वह आगे भी इसी तरह अच्छे काम करता रहे और अपने परिवार का नाम रोशन करे।
परिवार का मानना है कि बच्चों में कम उम्र से ही अच्छे संस्कार (अखलाक) और मजहबी समझ विकसित करना बेहद जरूरी होता है। हाशीम का यह कदम न केवल उसके परिवार बल्कि समाज के अन्य बच्चों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन सकता है।
👉 इस्लाम में रोजा (उपवास) को बेहद अहम इबादत माना गया है, जो रमजान के महीने में रखा जाता है। रोजे के जरिए इंसान सब्र, अनुशासन और आत्मसंयम सीखता है। (अधिक जानकारी के लिए देखें: https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8)
👉 बच्चों में धार्मिक और नैतिक शिक्षा के महत्व पर भी विशेषज्ञ जोर देते हैं, जिससे उनके व्यक्तित्व का समग्र विकास होता है। (संदर्भ: https://www.unicef.org/parenting/child-development)
हाशीम का पहला रोजा इस बात का उदाहरण है कि सही मार्गदर्शन और परिवार के सहयोग से बच्चे छोटी उम्र में भी बड़े लक्ष्य हासिल कर सकते हैं।

