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चार सौ वर्षों तक लगातार कुरआन की तिलावत — सुल्तान सलीम की रूहानी कहानी

💖 चार सौ वर्षों तक लगातार कुरआन की तिलावत — मोहब्बत और इमान का अटूट सिलसिला

कहते हैं, मोहब्बत जब हद से गुजर जाए, तो वह इबादत बन जाती है…
10वीं हिजरी में जब सुल्तान सलीम प्रथम को खिलाफ़त का ताज मिला, तो उनके दिल में बस एक ही तमन्ना थी — कि वह हज़रत मोहम्मद ﷺ से जुड़ी हर निशानी को अपनी आँखों के सामने रखें और उनकी ख़िदमत को अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सम्मान मानें।

सुल्तान सलीम ने मिस्र से पैग़ंबर-ए-अकरम ﷺ के तबर्रुकात (मुबारक निशानियाँ) को इस्तांबुल लाकर, उन्हें तोपकापी सराय के एक पवित्र कमरे में रखा।
लेकिन यह कोई आम कमरा नहीं था — यह जगह रूहानी नूर से भर दी गई थी।
सुल्तान स्वयं रोज़ अपने हाथों से इस कमरे की सफ़ाई करते थे…
सोचिए — एक बादशाह, जिसके सामने पूरी दुनिया झुकती थी, वह अपने हाथों में झाड़ू लिए, सिर झुकाए उस कमरे की खिदमत करता था —
क्योंकि यह सिर्फ सफाई नहीं, बल्कि मुहब्बत की सजदा थी।

फिर उन्होंने वहाँ हाफ़िज़-ए-कुरआन नियुक्त किए — जिन्होंने चौबीसों घंटे कुरआन की तिलावत का सिलसिला शुरू किया।
एक टोली की आवाज़ थमती, तो दूसरी टोली की तिलावत शुरू हो जाती।
और यूँ — चार सौ वर्षों तक बिना रुके अल्लाह का कलाम उस जगह गूंजता रहा…
ना दिन का सन्नाटा, ना रात की खामोशी — बस हर पल कुरआन की मिठास, हर लम्हे में रूह की ताजगी।

यह वो मुक़ाम था जहाँ वक्त ठहर गया था —
जहाँ हर सांस, हर हवा का झोंका, हर दीवार तिलावत की गवाही देती थी।

लेकिन जब खिलाफ़त खत्म हुई, तो वह पवित्र सिलसिला भी रुक गया…
मगर आज भी, कहते हैं कि अगर कोई उस कमरे में खड़ा हो, तो दिल के भीतर कहीं से धीमी सी आवाज़ आती है —
“अल्लाहु अकबर… बिस्मिल्लाह…”
मानो चार सौ साल की तिलावत अब भी वहाँ गूंज रही हो…

(स्रोत: जहांदीदा)


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Rashmi Bagdi
Rashmi Bagdi is a journalist and digital content creator associated with NewsNation Online. She specializes in reporting on local news, civic issues, education, government updates, and viral stories with a reader-focused approach.

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