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‘यौम-ए-बद्र’ का पैग़ाम ईमान और इंसाफ़ की ताक़त का प्रतीक: जालना में अमीर वहदत-ए-इस्लामी हिंद का ख़िताब

‘यौम-ए-बद्र’ का पैग़ाम ईमान, सब्र और इंसाफ़ की ताक़त का प्रतीक: जालना में अमीर वहदत-ए-इस्लामी हिंद का ख़िताब

जालना | प्रतिनिधि

मुक़द्दस माह-ए-रमज़ान के दौरान जालना शहर में वहदत-ए-इस्लामी हिंद, जालना की जानिब से शनिवार की रात तरावीह की नमाज़ के बाद एक दीऩी मजलिस और सार्वजनिक तक़रीर का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का केंद्रीय विषय ‘यौम-ए-बद्र’ रहा, जिस पर विस्तार से रोशनी डाली गई।

इस अवसर पर शहर और आसपास के इलाक़ों से बड़ी तादाद में लोगों ने शिरकत की और इस्लामी इतिहास की इस महत्वपूर्ण घटना से जुड़े संदेशों को ध्यानपूर्वक सुना। आयोजन का उद्देश्य रमज़ान के पवित्र महीने में लोगों को क़ुरआन की तालीमात, इस्लामी इतिहास और नैतिक मूल्यों से जोड़ना था।

इस्लाम में ग़ज़वा-ए-बद्र को एक ऐतिहासिक घटना माना जाता है, जो हिजरी सन 2 में रमज़ान के महीने में हुई थी। इस घटना के बारे में विस्तृत जानकारी इस्लामी अध्ययन से जुड़ी वेबसाइटों पर भी उपलब्ध है, जैसे:
https://quran.com
https://www.islamicity.org


क़ुरआन की तिलावत से हुआ कार्यक्रम का आग़ाज़

कार्यक्रम की शुरुआत छात्र अम्मार यासिर ने तिलावत-ए-क़ुरआन-ए-पाक से की। इसके बाद अफ़ान अहमद ख़ान ने उसका हिंदी तरजुमा पेश किया, जिससे मौजूद लोगों को आयतों का अर्थ समझने का अवसर मिला।

इस मौके पर मस्जिद बैदपुरा, सदर बाज़ार जालना के इमाम व ख़तीब मुफ़्ती हाफ़िज़ मुहम्मद तारिक़ अनवर ने नात-ए-पाक पेश की, जिससे महफ़िल का माहौल पूरी तरह रूहानी बन गया।

प्रारंभ में लियाक़त अली ख़ान ने कार्यक्रम के मक़सद पर रोशनी डालते हुए बताया कि ऐसे कार्यक्रमों का उद्देश्य समाज में दीऩी समझ, नैतिकता और इंसानियत के मूल्यों को मज़बूत करना है। उन्होंने वहदत-ए-इस्लामी हिंद के उद्देश्यों, संगठन की कार्यप्रणाली और समाज में किए जा रहे विभिन्न धार्मिक व सामाजिक कार्यों की जानकारी भी दी।


‘यौम-ए-बद्र’ का ऐतिहासिक महत्व

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता अमीर वहदत-ए-इस्लामी हिंद मुहम्मद जियाउद्दीन सिद्दीकी थे। उन्होंने अपने संबोधन में ‘यौम-ए-बद्र’ के ऐतिहासिक महत्व और उसके संदेश पर विस्तार से चर्चा की।

उन्होंने कहा कि इस्लामी इतिहास में ग़ज़वा-ए-बद्र एक ऐसी घटना है जिसने हक़ और बातिल के बीच फर्क को स्पष्ट कर दिया। इसी कारण इस दिन को “यौम-उल-फुरक़ान” भी कहा जाता है।

उन्होंने कहा कि माह-ए-रमज़ान की असल फ़ज़ीलत इस बात से जुड़ी है कि इसी महीने में क़ुरआन-ए-मजीद का नुज़ूल हुआ। क़ुरआन इंसानियत के लिए रहनुमाई और हिदायत का स्रोत है, जो सही और गलत के बीच स्पष्ट मार्गदर्शन देता है।

उन्होंने कहा कि जो लोग क़ुरआन की तालीमात को अपनी ज़िंदगी में अपनाते हैं, उन्हें समाज में इज़्ज़त और बुलंदी हासिल होती है। रमज़ान के इसी महीने में एक मुबारक रात भी आती है जिसे लैलतुल क़द्र कहा जाता है और जिसे हज़ार महीनों से बेहतर बताया गया है।


क़ुरआन को बताया अल्लाह का कलाम

अपने संबोधन में मुहम्मद जियाउद्दीन सिद्दीकी ने कहा कि क़ुरआन-ए-पाक वह किताब है जो खुद को अल्लाह का कलाम बताती है। उन्होंने कहा कि दुनिया के अन्य मज़हबी ग्रंथ इस तरह का दावा नहीं करते।

उन्होंने यह भी बताया कि क़ुरआन में तौरात, ज़बूर और इंजील जैसे अन्य आसमानी ग्रंथों का भी उल्लेख मिलता है, जिन्हें अलग-अलग दौर में इंसानों की रहनुमाई के लिए भेजा गया था।

उन्होंने कहा कि क़ुरआन ने इंसानी समाज में अख़लाक़, सच्चाई, पवित्रता और अच्छे चरित्र को बढ़ावा दिया है और इतिहास में मुस्लिम समाज की तरक्की में इसकी बड़ी भूमिका रही है।


इल्म और साइंस में मुस्लिम विद्वानों का योगदान

अपने बयान में उन्होंने कहा कि इतिहास में मुस्लिम विद्वानों ने इल्म, तिब (चिकित्सा), फ़लसफ़ा, समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र जैसे कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि इब्न सीना (अबू अली सीना) अपने समय के महान चिकित्सक और वैज्ञानिक थे। इसी तरह इब्न खलदून, जाबिर बिन हय्यान और इब्न नफीस जैसे विद्वानों ने भी ज्ञान और विज्ञान की दुनिया में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

उन्होंने बताया कि इब्न नफीस ने लगभग 800 वर्ष पहले मानव शरीर में रक्त परिसंचरण प्रणाली पर महत्वपूर्ण शोध किया था, जिसे चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जाता है।

उन्होंने यह भी कहा कि इस्लाम में ज्ञान को बहुत महत्व दिया गया है और क़ुरआन का पहला शब्द “इक़रा” (पढ़ो) है, जो ज्ञान प्राप्त करने का स्पष्ट संदेश देता है।


A group of men and children sitting on the floor in a mosque setting, attentively listening to a speaker at the front. They are dressed in traditional attire, with some wearing caps. The interior features arches and decorative elements.
A gathering of community members during a religious event in Jalna focused on the teachings and historical significance of Yawm e Badr

ईमान, एकता और अच्छे चरित्र का संदेश

अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि किसी भी समाज की सफलता केवल संख्या से नहीं बल्कि ईमानदारी, नैतिकता और मजबूत विश्वास से तय होती है।

उन्होंने ग़ज़वा-ए-बद्र का हवाला देते हुए कहा कि यह घटना हमें सिखाती है कि ईमान का रिश्ता खून के रिश्तों से भी अधिक मजबूत होता है

उन्होंने मुस्लिम समाज से अपील की कि वे ज्ञान, अख़लाक़, एकता और इंसानियत के रास्ते पर चलें और समाज के लिए सकारात्मक भूमिका निभाएं।


दुआ के साथ कार्यक्रम का समापन

कार्यक्रम के अंत में हाफ़िज़ ज़ुबैर अहमद फ़ारूक़ी की दुआ के साथ इस दीऩी मजलिस का समापन हुआ।

इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए वहदत-ए-इस्लामी हिंद, जालना के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने विशेष प्रयास किए। बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी ने इस आयोजन को सफल और प्रभावशाली बना दिया।

Two men sitting in a religious setting, one seated on a chair and the other on the floor, with decorative architecture visible in the background.
Spiritual leaders engaged in a significant discussion during the Yawm e Badr event in Jalna

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