तकनीकी जमानत पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश, गंभीर अपराधों में अब ‘प्रक्रिया’ नहीं, ‘गुनाह’ होगा निर्णायक
नई दिल्ली:
मुंबई के एक नाइटक्लब में गर्भवती महिला कर्मचारी पर हुए जघन्य हमले के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तकनीकी आधार पर दी गई जमानत को लेकर कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी, जिसमें तकनीकी कारणों से दी गई जमानत को रद्द किया गया था। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को एक सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। तकनीकी जमानत पर सुप्रीम कोर्ट सख्त.
इस फैसले को आपराधिक न्याय प्रणाली में एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि अदालत ने साफ संकेत दिया है कि गंभीर अपराधों में तकनीकी खामियों के आधार पर राहत नहीं दी जा सकती और अपराध की गंभीरता सर्वोपरि होगी।
क्या है पूरा मामला
यह मामला मुंबई के एक प्रतिष्ठित नाइटक्लब में हुई दिल दहला देने वाली घटना से जुड़ा है।
15 नवंबर की रात, आठ सप्ताह की गर्भवती महिला कर्मचारी अपनी ड्यूटी पूरी कर तड़के लिफ्ट से नीचे जा रही थी। इसी दौरान कथित रूप से नशे की हालत में मौजूद आरोपी रिदम अरविंद गोयल ने अपने साथियों के साथ महिला से अभद्र व्यवहार किया। महिला द्वारा विरोध करने पर आरोपी ने उस पर हमला किया।
पीड़िता के अनुसार, गर्भवती होने की जानकारी देने और रहम की गुहार लगाने के बावजूद आरोपी ने उसके पेट पर लात-घूंसे मारे। अस्पताल में उपचार के दौरान महिला का गर्भपात हो गया। इसके बाद आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया।
भारतीय न्याय संहिता से जुड़ी जानकारी:
👉 https://legislative.gov.in
सत्र न्यायालय से हाईकोर्ट तक का सफर
सत्र न्यायालय ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की कुछ प्रक्रियात्मक शर्तों के पालन में कथित कमी का हवाला देते हुए आरोपी को जमानत दे दी थी।
हालांकि, पीड़िता की याचिका पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट कहा कि मामले के गुण-दोष पर विचार किए बिना केवल तकनीकी आधार पर जमानत देना कानून की भावना के विपरीत है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता पर विवरण:
👉 https://legislative.gov.in
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
आरोपी ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जे. के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए. जी. मसीह की पीठ के समक्ष हुई।
अदालत ने बिना आत्मसमर्पण के जमानत पर सुनवाई की मांग को सिरे से खारिज कर दिया और आरोपी को एक सप्ताह में समर्पण करने का निर्देश दिया।
पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि
“गंभीर अपराधों में तकनीकी चूक को ढाल नहीं बनाया जा सकता।”
सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट:
👉 https://main.sci.gov.in
कानूनी जगत से प्रतिक्रिया
नोटरी एसोसिएशन के कार्याध्यक्ष महेश धन्नावत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह निर्णय न्यायपालिका में जनता के भरोसे को मजबूत करता है।
उन्होंने कहा कि गंभीर अपराधों में तकनीकी खामियों के आधार पर आरोपी को राहत देना समाज के लिए घातक हो सकता है, विशेषकर महिलाओं के खिलाफ अपराधों में अदालतों का सख्त और संवेदनशील रुख बेहद जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि
- सत्र न्यायालय द्वारा केवल तकनीकी आधार पर दी गई जमानत “स्पष्ट त्रुटि” है।
- आरोपी को आत्मसमर्पण के बाद गुण-दोष के आधार पर पुनः जमानत के लिए आवेदन करने की अनुमति दी गई है।
- सत्र न्यायालय को निर्देश दिया गया है कि वह किसी भी दबाव के बिना, एक सप्ताह के भीतर नए जमानत आवेदन पर निर्णय करे।
क्यों अहम है यह फैसला
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला आने वाले समय में गंभीर आपराधिक मामलों में तकनीकी जमानत की प्रवृत्ति पर रोक लगाएगा। अदालतें अब
- अपराध की प्रकृति,
- समाज पर उसके प्रभाव, और
- पीड़ित के अधिकारों
को केंद्र में रखकर निर्णय लेने की दिशा में आगे बढ़ेंगी।
निष्कर्षतः, यह निर्णय न केवल पीड़िता के लिए न्याय की उम्मीद है, बल्कि यह आपराधिक न्याय प्रणाली की नैतिक मजबूती और विश्वसनीयता को भी सुदृढ़ करता है।
तकनीकी जमानत पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

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