जालना के किसानों के सामने फिर खड़ा हुआ संकट, 14 वर्षों में 5 बार सूखा और 8 बार अतिवृष्टि
मौसम की अनिश्चितता ने बढ़ाई चिंता, आगामी मानसून पर टिकी किसानों की उम्मीदें
जालना: Al Nino Effect Jalna मराठवाड़ा के जालना जिले में बदलते मौसम का प्रभाव कृषि क्षेत्र पर लगातार गहराता जा रहा है। कभी भीषण सूखा तो कभी रिकॉर्ड अतिवृष्टि, पिछले डेढ़ दशक में जिले के किसानों ने मौसम के दोनों चरम रूपों का सामना किया है। अब मौसम वैज्ञानिकों द्वारा अल नीनो (El Niño) के प्रभाव में वृद्धि की आशंका व्यक्त किए जाने के बाद किसानों की चिंताएं एक बार फिर बढ़ गई हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस वर्ष अल नीनो का प्रभाव मजबूत होता है तो मानसून सामान्य से कमजोर रह सकता है। इसका सीधा असर खरीफ फसलों की बुवाई, उत्पादन और किसानों की आय पर पड़ सकता है। ऐसे समय में जब कृषि पहले से ही मौसम की अनिश्चितताओं से जूझ रही है, अल नीनो की संभावना किसानों के लिए नई चुनौती बनकर सामने आई है।
क्या है अल नीनो और क्यों बढ़ जाती है चिंता?
अल नीनो प्रशांत महासागर के जल तापमान में होने वाला एक असामान्य परिवर्तन है, जिसका असर दुनिया भर के मौसम पैटर्न पर पड़ता है। भारत में अल नीनो का संबंध अक्सर कमजोर मानसून और कम वर्षा से जोड़ा जाता है।
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार अल नीनो की स्थिति बनने पर मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ सकती हैं, जिससे देश के कई हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा दर्ज होती है। मराठवाड़ा जैसे पहले से जल संकट झेल रहे क्षेत्रों पर इसका प्रभाव अधिक गंभीर हो सकता है।
2012 का भीषण सूखा आज भी किसानों को याद
जालना जिला लंबे समय से सूखा प्रभावित क्षेत्रों में शामिल रहा है। वर्ष 2012 जिले के इतिहास में सबसे कठिन वर्षों में गिना जाता है। उस वर्ष जिले में सामान्य वर्षा का केवल 44 प्रतिशत पानी ही बरसा था।
बारिश की भारी कमी के कारण पेयजल संकट उत्पन्न हो गया था। कई गांवों में टैंकरों के माध्यम से पानी की आपूर्ति करनी पड़ी थी। पशुओं के लिए चारे का भी गंभीर संकट पैदा हो गया था। किसानों की फसलें बर्बाद हुईं और हजारों परिवारों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।
2013 में राहत, लेकिन फिर लौट आया सूखा
वर्ष 2013 में मानसून ने कुछ राहत दी और जिले में 116 प्रतिशत वर्षा दर्ज की गई। अच्छी बारिश के कारण जलाशयों और कुओं में जलस्तर बढ़ा तथा किसानों को राहत मिली।
लेकिन यह राहत अधिक समय तक कायम नहीं रह सकी। वर्ष 2014 और 2015 में लगातार कम बारिश हुई। वर्ष 2014 में केवल 54 प्रतिशत और 2015 में लगभग 66 प्रतिशत वर्षा दर्ज की गई। लगातार दो वर्षों तक कम बारिश होने के कारण जल संकट और कृषि संकट दोनों गहरा गए।
कई किसानों को वैकल्पिक रोजगार की तलाश करनी पड़ी, जबकि अनेक गांवों में पेयजल संकट फिर से गंभीर रूप ले गया।
2016 और 2017 में सामान्य हुई स्थिति
वर्ष 2016 में जिले में 113 प्रतिशत वर्षा दर्ज की गई, जिससे किसानों को काफी राहत मिली। इसके बाद 2017 में भी लगभग सामान्य वर्षा हुई। हालांकि अच्छी बारिश के बावजूद भूजल स्तर और सिंचाई संबंधी समस्याएं पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकीं।
विशेषज्ञों का कहना है कि मराठवाड़ा क्षेत्र में वर्षा की अनियमितता और जल संरक्षण की चुनौतियां लंबे समय से बनी हुई हैं। इसलिए एक-दो वर्षों की अच्छी बारिश स्थायी समाधान नहीं बन पाती।
2018 में फिर बढ़ी मुश्किलें
वर्ष 2018 में जिले में केवल 61 प्रतिशत वर्षा दर्ज की गई। बारिश की कमी के कारण खरीफ फसलें प्रभावित हुईं और किसानों को उत्पादन में गिरावट का सामना करना पड़ा।
बारिश की अनिश्चितता के कारण किसानों की लागत बढ़ती गई जबकि उत्पादन घटता गया। इससे कृषि क्षेत्र की आर्थिक स्थिति और कमजोर हुई।
अतिवृष्टि ने भी पहुंचाया भारी नुकसान
जहां एक ओर सूखा किसानों के लिए बड़ी चुनौती रहा, वहीं दूसरी ओर अतिवृष्टि ने भी किसानों की मुश्किलें कम नहीं होने दीं।
वर्ष 2020 से 2022 तक लगातार तीन वर्षों में जिले ने अत्यधिक वर्षा का सामना किया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार:
- वर्ष 2020 में 157 प्रतिशत वर्षा
- वर्ष 2021 में 183 प्रतिशत वर्षा
- वर्ष 2022 में 143 प्रतिशत वर्षा
दर्ज की गई।
अत्यधिक बारिश के कारण खेतों में जलभराव की स्थिति बन गई। सोयाबीन, कपास, तूर और अन्य खरीफ फसलों को भारी नुकसान हुआ। कई क्षेत्रों में फसलें पूरी तरह नष्ट हो गईं, जिससे किसानों को लाखों रुपये का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा।
2023 में फिर लौटा सूखे का खतरा
लगातार तीन वर्षों की अतिवृष्टि के बाद वर्ष 2023 में मानसून कमजोर रहा और जिले में केवल 73 प्रतिशत वर्षा दर्ज की गई।
बारिश की कमी के कारण कई क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई। किसानों को बुवाई और सिंचाई दोनों में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उत्पादन में कमी आने से कृषि आय प्रभावित हुई।
हालांकि वर्ष 2024 और 2025 में अपेक्षाकृत अच्छी वर्षा दर्ज की गई, लेकिन कई स्थानों पर अतिवृष्टि के कारण फसलों को नुकसान पहुंचा।
घनसावंगी, अंबड और मंठा क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित
कृषि विभाग के अनुसार वर्ष 2025 में जालना जिले के कई हिस्सों में भारी वर्षा के कारण फसलों को नुकसान हुआ।
विशेष रूप से:
- घनसावंगी
- अंबड
- मंठा
- जालना
तहसीलों में खरीफ फसलें प्रभावित हुईं। खेतों में लंबे समय तक पानी जमा रहने से उत्पादन घटा और किसानों की लागत बढ़ गई।
कृषि विभाग ने बढ़ाई सतर्कता
संभावित अल नीनो प्रभाव को देखते हुए कृषि विभाग ने किसानों को जागरूक करने के प्रयास तेज कर दिए हैं।
विभाग द्वारा किसानों को निम्नलिखित विषयों पर मार्गदर्शन दिया जा रहा है:
- कम पानी में होने वाली फसलें
- जल संरक्षण तकनीक
- सूक्ष्म सिंचाई पद्धति
- मौसम आधारित कृषि योजना
- फसल विविधीकरण
- वैकल्पिक कृषि तकनीक
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मानसून सामान्य से कम रहता है तो खरीफ बुवाई में देरी हो सकती है, जिससे उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है।
मौसम आधारित खेती की बढ़ी जरूरत
कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि बदलते जलवायु चक्र को देखते हुए किसानों को पारंपरिक खेती के साथ आधुनिक तकनीकों को अपनाना होगा।
मौसम पूर्वानुमान के आधार पर फसल चयन, जल संरक्षण और सूखा सहनशील किस्मों का उपयोग भविष्य में किसानों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
आगामी मानसून पर टिकी उम्मीदें
पिछले 14 वर्षों में जालना जिले ने पांच बार सूखे और आठ बार अतिवृष्टि जैसी स्थितियों का सामना किया है। इससे स्पष्ट है कि मौसम की अनिश्चितता लगातार बढ़ रही है।
अब किसानों की निगाहें आगामी मानसून पर टिकी हैं। यदि बारिश सामान्य रहती है तो कृषि क्षेत्र को राहत मिल सकती है, लेकिन यदि अल नीनो का प्रभाव बढ़ता है तो जिले के किसानों को एक बार फिर नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
ऐसे में प्रशासन, कृषि विभाग और किसानों के बीच बेहतर समन्वय तथा वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों का उपयोग ही भविष्य में कृषि क्षेत्र को स्थिरता प्रदान कर सकता है।
Internal Links (NewsNationOnline)
External Links
- India Meteorological Department (IMD)
- Ministry of Agriculture & Farmers Welfare
- Indian Council of Agricultural Research (ICAR)
यदि यह लेख विशेषज्ञ (Expert) स्तर का बनाना है, तो इसमें केवल वर्षा के आंकड़े नहीं बल्कि जलवायु परिवर्तन, एल नीनो के वैज्ञानिक प्रभाव, फसल अर्थव्यवस्था, भूजल संकट, कृषि विशेषज्ञों की राय और भविष्य की रणनीति को भी शामिल करना चाहिए। इससे लेख अधिक प्रामाणिक, विश्लेषणात्मक और राष्ट्रीय स्तर के समाचार पोर्टलों जैसा दिखाई देगा।
विशेषज्ञों की राय: क्यों बढ़ रही है चिंता?
कृषि और मौसम विशेषज्ञों के अनुसार मराठवाड़ा क्षेत्र पहले से ही जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के प्रभावों के प्रति संवेदनशील माना जाता है। पिछले एक दशक में वर्षा का स्वरूप तेजी से बदला है। पहले जहां मानसून चार महीनों में संतुलित रूप से वर्षा देता था, वहीं अब कम दिनों में अत्यधिक बारिश और लंबे शुष्क अंतराल देखने को मिल रहे हैं।
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि एल नीनो की स्थिति बनने पर भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून कमजोर पड़ सकता है। इसका असर विशेष रूप से उन क्षेत्रों पर अधिक पड़ता है जो पहले से वर्षा पर निर्भर कृषि करते हैं। जालना जिले की अधिकांश खेती आज भी मानसूनी वर्षा पर आधारित है, इसलिए यहां एल नीनो का प्रभाव गंभीर हो सकता है।
कृषि अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है बड़ा असर
जालना जिले की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर है। सोयाबीन, कपास, तूर, मक्का और ज्वार यहां की प्रमुख फसलें हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि मानसून कमजोर रहता है तो:
- खरीफ बुवाई में देरी हो सकती है।
- बीज अंकुरण प्रभावित हो सकता है।
- सिंचाई लागत बढ़ सकती है।
- उत्पादन में गिरावट आ सकती है।
- किसानों की आय प्रभावित हो सकती है।
- कृषि ऋण चुकाने में कठिनाई बढ़ सकती है।
कृषि अर्थशास्त्रियों का मानना है कि लगातार मौसमीय अस्थिरता ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी असर डालती है, क्योंकि कृषि आधारित रोजगार और स्थानीय व्यापार सीधे खेती पर निर्भर रहते हैं।
जल संकट भी बन सकता है बड़ी चुनौती
विशेषज्ञों का कहना है कि जालना जिले की सबसे बड़ी समस्या केवल कम वर्षा नहीं बल्कि भूजल पर बढ़ती निर्भरता भी है।
लगातार सूखे के वर्षों में बड़ी संख्या में किसानों ने बोरवेल पर निर्भरता बढ़ाई है। यदि इस वर्ष मानसून सामान्य से कम रहता है तो भूजल स्तर पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
जल विशेषज्ञों के अनुसार:
“मराठवाड़ा को अब केवल वर्षा की मात्रा नहीं बल्कि जल प्रबंधन पर भी ध्यान देना होगा। जल संरक्षण के बिना भविष्य में कृषि संकट और गहरा सकता है।”
जलवायु परिवर्तन का दिख रहा स्पष्ट प्रभाव
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार जालना सहित पूरे मराठवाड़ा में जलवायु परिवर्तन के संकेत स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं।
पिछले 14 वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि:
- 5 बार सूखे जैसी स्थिति बनी।
- 8 बार सामान्य से अधिक वर्षा दर्ज हुई।
- वर्षा का वितरण असंतुलित रहा।
- अत्यधिक बारिश की घटनाएं बढ़ीं।
- लंबे शुष्क अंतराल देखने को मिले।
विशेषज्ञ इसे “Climate Extremes” की श्रेणी में रखते हैं, जहां मौसम सामान्य पैटर्न से हटकर चरम स्थितियां पैदा करता है।
किसानों को क्या करना चाहिए?
कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि विभाग के विशेषज्ञ किसानों को निम्नलिखित उपाय अपनाने की सलाह दे रहे हैं:
- कम अवधि वाली फसल किस्मों का चयन
- सूखा सहनशील बीजों का उपयोग
- ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई अपनाना
- खेत तालाब निर्माण
- फसल बीमा करवाना
- मौसम पूर्वानुमान के आधार पर कृषि कार्य करना
- फसल विविधीकरण को बढ़ावा देना
निष्कर्ष
जालना जिले में पिछले 14 वर्षों के दौरान कभी सूखा तो कभी अतिवृष्टि ने किसानों को भारी नुकसान पहुंचाया है। अब एल नीनो की संभावित वापसी ने चिंताओं को और बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अच्छी बारिश की उम्मीद पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि जल संरक्षण, आधुनिक कृषि तकनीकों और मौसम आधारित खेती को अपनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुका है।
यदि आगामी मानसून सामान्य रहता है तो किसानों को राहत मिल सकती है, लेकिन कमजोर मानसून की स्थिति में जालना सहित पूरे मराठवाड़ा को फिर से कृषि और जल संकट की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
Al Nino Effect Jalna

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