जलाशयों में सिर्फ 36% पानी, प्रशासन ने बनाई ₹16.42 करोड़ की योजना
जालना, 9 मई 2026 | जालना जिले में इस गर्मी के मौसम में जल संकट अपने चरम पर पहुंच गया है। जिले के प्रमुख जलाशयों और जल भंडारों में मात्र 36 प्रतिशत पानी शेष बचा है, जबकि मई और जून के महीने अभी बाकी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भूजल स्तर इतनी तेजी से नीचे गिरा है कि सैकड़ों कुएं और प्राकृतिक जल स्रोत पूरी तरह सूख चुके हैं। अनुमान है कि जिले के करीब 561 गांव और 140 बस्तियां इस संकट की चपेट में आने वाली हैं।
जमीन के नीचे से भी गायब हो रहा पानी
लघु पाटबंधारे विभाग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, जालना जिले की मध्यम और लघु जल परियोजनाओं में जलस्तर खतरनाक रफ्तार से घट रहा है। जिले की 7 प्रमुख परियोजनाओं में से किसी में भी आधे से ज्यादा पानी नहीं बचा है। गर्मी के साथ-साथ वाष्पीकरण की दर बढ़ी है, जिसने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।
जालना तालुका के कई गांवों में महिलाओं और बच्चों को पानी के लिए मीलों पैदल चलना पड़ रहा है। भूजल सर्वेक्षण विभाग की रिपोर्ट बताती है कि इस बार पिछले साल के मुकाबले भूजल स्तर में औसतन 3 से 5 फुट की अतिरिक्त गिरावट दर्ज की गई है। कुओं के सूखने से न केवल पेयजल की समस्या बढ़ी है, बल्कि पशुपालकों को भी अपने मवेशियों की प्यास बुझाने के लिए कठिन संघर्ष करना पड़ रहा है।
17 टैंकर चला रहे हैं पानी की जिंदगी
फिलहाल जिला प्रशासन ने 17 टैंकरों के माध्यम से प्रभावित गांवों में जलापूर्ति शुरू की है। वर्तमान में 6 प्रमुख गांव और 9 छोटी बस्तियों में टैंकरों से पानी पहुंचाया जा रहा है। जहां पारंपरिक जल स्रोत पूरी तरह समाप्त हो चुके हैं, वहां 13 निजी कुओं का अधिग्रहण कर वैकल्पिक व्यवस्था की गई है।
टैंकर चालकों के अनुसार, हर दिन की स्थिति बदल रही है। कुछ गांवों में एक टैंकर पर्याप्त होता है, लेकिन कुछ इलाकों में दो से तीन चक्कर लगाने पड़ते हैं। ग्रामीणों की संख्या के अनुसार पानी का वितरण सुनिश्चित किया जा रहा है, हालांकि जैसे-जैसे गर्मी बढ़ रही है, मांग भी बढ़ती जा रही है।
₹16.42 करोड़ की एक्शन प्लान मंजूर
जिले में संभावित सूखे की स्थिति को देखते हुए जिला प्रशासन ने पहले से तैयारी शुरू कर दी थी। जिला भूजल सर्वेक्षण एजेंसी और जिला परिषद के ग्रामीण जलापूर्ति विभाग ने मिलकर जनवरी से जून 2026 तक की अवधि के लिए एक विस्तृत जल संकट निवारण योजना तैयार की है। इस योजना को ₹16.42 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी जा चुकी है।
इस योजना के तहत नए टैंकर किराये पर लेना, निजी कुओं का अधिग्रहण, पाइपलाइन की मरम्मत और वैकल्पिक जलस्रोतों की पहचान शामिल है। प्रशासन का कहना है कि योजना का क्रियान्वयन चरणबद्ध तरीके से किया जा रहा है और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त टैंकर तैनात किए जाएंगे।
मनुष्य ही नहीं, खेती भी प्यासी
जालना जिला कृषि प्रधान क्षेत्र है। यहां मोसंबी, सोयाबीन और कपास की खेती बड़े पैमाने पर होती है। जल संकट ने किसानों की कमर तोड़ दी है। कई किसानों के मोसंबी के बाग सूखने की कगार पर हैं। पानी के अभाव में फसलें बचाना मुश्किल हो रहा है।
भटकल तालुका के एक किसान ने बताया कि वह अपने बाग को बचाने के लिए हर दिन निजी टैंकर बुलाते हैं, जिस पर प्रतिदिन हजारों रुपये का खर्च आता है। यह खर्च उनकी आमदनी से कहीं ज्यादा है। अनेक किसान इस स्थिति में कर्ज लेने पर मजबूर हो रहे हैं।
जिले के कृषि अधिकारियों के अनुसार, अगर मई के अंत तक बारिश नहीं हुई, तो खरीफ की बुवाई पर भी गंभीर असर पड़ सकता है। इससे न सिर्फ किसानों की आजीविका बल्कि जिले की पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा सकती है।
महिलाओं और बच्चों पर सबसे ज्यादा बोझ
जल संकट का सबसे अधिक बोझ ग्रामीण महिलाओं पर पड़ता है। जालना के दूरदराज के गांवों में महिलाएं सुबह 4 बजे उठकर पानी की तलाश में निकल पड़ती हैं। कुएं, तालाब और हैंडपंप सूख जाने के बाद उन्हें दूर-दूर तक जाना पड़ता है।
स्कूल जाने वाली बच्चियों को भी कई बार पानी लाने के काम में लगना पड़ता है, जिससे उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जल संकट के दौरान बालिका शिक्षा पर सबसे पहले असर पड़ता है।
प्रशासन की अपील — पानी की बर्बादी बंद करें
जिला कलेक्टर कार्यालय की ओर से जिलेवासियों से अपील की गई है कि वे पानी का अनावश्यक उपयोग न करें। शादी-समारोहों और अन्य सार्वजनिक कार्यक्रमों में पानी की खपत कम से कम रखने की सलाह दी गई है। नगर परिषद ने भी शहरी क्षेत्रों में पानी की सप्लाई का समय निर्धारित कर दिया है।
आगे क्या होगा?
मौसम विभाग के अनुसार जालना क्षेत्र में मानसून की सामान्य तिथि 15 जून के आसपास है। यानी अभी करीब डेढ़ महीने का लंबा इंतजार बाकी है। इस दौरान स्थिति और विकराल होने की आशंका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जालना में जल संकट सिर्फ मौसमी नहीं, बल्कि संरचनात्मक समस्या है। जल संरक्षण, वर्षाजल संग्रहण और भूजल पुनर्भरण के लिए दीर्घकालिक उपाय किए बिना हर साल यही स्थिति दोहराई जाएगी। सरकार और प्रशासन को चाहिए कि वे तात्कालिक राहत के साथ-साथ स्थायी समाधान की दिशा में भी ठोस कदम उठाएं।
जालना के नागरिकों और किसानों की निगाहें अब आसमान पर टिकी हैं — एक बरसात की बूंद के इंतजार में।
रिपोर्ट: न्यूज नेशन ऑनलाइन, जालना ब्यूरो | प्रकाशन तिथि: 9 मई 2026
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