यूरिक एसिड शरीर में बनने वाला एक सामान्य अपशिष्ट पदार्थ है, जो प्यूरीन नामक तत्व के टूटने से बनता है। आमतौर पर किडनी इसे शरीर से बाहर निकाल देती है, लेकिन जब इसकी मात्रा बढ़ जाती है या किडनी इसे सही तरीके से बाहर नहीं निकाल पाती, तब यह जोड़ों में जमा होने लगता है। इसके कारण एड़ी, टखनों, घुटनों और हाथ-पैर की उंगलियों में तेज दर्द, सूजन और चलने-फिरने में परेशानी हो सकती है।
यूरिक एसिड में कौन-सी दाल खाना बेहतर है?
आयुर्वेद विशेषज्ञों के अनुसार, मूंग दाल यूरिक एसिड के मरीजों के लिए बेहतर विकल्प मानी जाती है। यह हल्की होती है, आसानी से पच जाती है और इसमें प्यूरीन की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है। दाल को 1-2 घंटे भिगोकर अच्छी तरह पकाकर खाने से पाचन और बेहतर होता है। इसके अलावा लाल मसूर दाल का सीमित मात्रा में सेवन भी किया जा सकता है।
इन दालों का सेवन सीमित रखें
अगर यूरिक एसिड पहले से बढ़ा हुआ है तो चना दाल, अरहर दाल और मटर की दाल का सेवन कम करना चाहिए। वहीं राजमा, छोले और काले चने जैसे हाई प्रोटीन और अधिक प्यूरीन वाले खाद्य पदार्थ भी सीमित मात्रा में ही खाने की सलाह दी जाती है। इनका अधिक सेवन यूरिक एसिड के स्तर को बढ़ा सकता है।
डाइट में किन बातों का रखें ध्यान?
यूरिक एसिड को नियंत्रित रखने के लिए दिनभर पर्याप्त पानी पीना जरूरी है। मीठे पेय, अत्यधिक चीनी, शराब, तला-भुना भोजन और अधिक मात्रा में नॉनवेज से दूरी बनानी चाहिए। संतुलित भोजन में चावल, क्विनोआ और हरी सब्जियों को शामिल करना लाभदायक हो सकता है। नियमित व्यायाम और सुबह गुनगुना पानी पीने की आदत भी मेटाबॉलिज्म को बेहतर बनाने में मदद करती है।
डॉक्टर की सलाह के साथ ही करें डाइट में बदलाव
हर व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति अलग होती है। यदि यूरिक एसिड लगातार बढ़ा हुआ है या बार-बार जोड़ों में दर्द और सूजन की समस्या रहती है, तो केवल घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय डॉक्टर या डाइटिशियन की सलाह जरूर लें। सही खानपान, नियमित जांच और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर यूरिक एसिड को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
यूरिक एसिड को नियंत्रित करने में दवाओं के साथ सही डाइट की भी अहम भूमिका होती है। मूंग दाल और सीमित मात्रा में मसूर दाल बेहतर विकल्प हो सकती हैं, जबकि अधिक प्यूरीन वाली दालों और प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन संतुलित रखना जरूरी है। स्वस्थ खानपान और नियमित दिनचर्या अपनाकर इस समस्या से होने वाली तकलीफ को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
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