पिछले कुछ वर्षों में वयस्कों में ऑटिज्म के मामलों की पहचान तेजी से बढ़ी है। इसका मतलब यह नहीं कि पहले ऑटिज्म कम था, बल्कि पहले इसकी सही पहचान नहीं हो पाती थी। विशेषज्ञों के अनुसार अब मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ी है और लोग अपने व्यवहार, भावनाओं और सामाजिक अनुभवों को बेहतर तरीके से समझने लगे हैं। इसी वजह से कई लोगों को वर्षों बाद पता चल रहा है कि वे ऑटिज्म स्पेक्ट्रम का हिस्सा हैं।
पुरानी सोच बनी पहचान में सबसे बड़ी बाधा
पहले ऑटिज्म की एक तय छवि बना दी गई थी कि यह केवल छोटे बच्चों में दिखाई देता है, जिन्हें बोलने या सामाजिक व्यवहार में परेशानी होती है। लेकिन हर व्यक्ति में ऑटिज्म के लक्षण एक जैसे नहीं होते। कई लोग शांत स्वभाव, अकेले रहना पसंद करने या सामाजिक परिस्थितियों में असहज महसूस करने जैसी बातों के साथ बड़े हो जाते हैं, जिन्हें सामान्य व्यक्तित्व मान लिया जाता है। यही कारण है कि उनकी पहचान वर्षों तक नहीं हो पाती।
‘मास्किंग’ की वजह से छिप जाते हैं लक्षण
विशेषज्ञ बताते हैं कि कई लोग बचपन से ही अपने व्यवहार को दूसरों के अनुसार ढालना सीख लेते हैं। वे लोगों की नकल करके बातचीत करना, सामाजिक नियम याद रखना और अपनी वास्तविक भावनाओं को छिपाना सीख जाते हैं। इस प्रक्रिया को मास्किंग कहा जाता है। बाहर से सब सामान्य दिखाई देता है, लेकिन भीतर मानसिक थकान, तनाव और बेचैनी लगातार बढ़ती रहती है। यही वजह है कि कई बार व्यक्ति खुद भी नहीं समझ पाता कि उसकी परेशानी की असली वजह क्या है।
महिलाओं में अक्सर देर से होती है पहचान
ऑटिज्म की पहचान महिलाओं में और भी देर से होती है। शुरुआती शोध मुख्य रूप से पुरुषों पर आधारित थे, इसलिए महिलाओं में दिखाई देने वाले अलग तरह के संकेतों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। उन्हें अक्सर जरूरत से ज्यादा भावुक, शर्मीला या अधिक सोचने वाला कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता था। इससे सही निदान में कई साल लग जाते हैं।
सही पहचान से मिलती है राहत, डर नहीं
आज सोशल मीडिया, जागरूकता अभियान और लोगों के व्यक्तिगत अनुभवों ने ऑटिज्म को लेकर समझ बढ़ाई है। कई वयस्क किसी और की कहानी सुनकर खुद को पहचान पाते हैं। सही निदान मिलने के बाद उन्हें यह एहसास होता है कि वे गलत नहीं थे, बल्कि उनका मस्तिष्क अलग तरीके से काम करता है। यह पहचान उनके रिश्तों, करियर और जीवन के अनुभवों को नई नजर से समझने में मदद करती है। समय पर सही जानकारी और विशेषज्ञ की सलाह व्यक्ति को बेहतर मानसिक स्वास्थ्य और आत्मस्वीकृति की दिशा में आगे बढ़ाती है।
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