Diabetes: “करेला कौन खाता है?” यह सवाल शायद हर भारतीय बच्चे ने कभी न कभी अपनी मां से जरूर पूछा होगा। बचपन में थाली में रखे करेले, मेथी या नीम की पत्तियों को देखकर मुंह बनाना आम बात थी। लेकिन हमारी दादी-नानी और मां हमेशा कहती थीं कि थोड़ा कड़वा खाना सेहत के लिए जरूरी होता है। आज आधुनिक विज्ञान और वैश्विक वेलनेस इंडस्ट्री भी इसी बात को मानने लगी है। भारतीय खानपान में कड़वे स्वाद को केवल स्वाद के रूप में नहीं बल्कि शरीर को मौसम के अनुसार संतुलित रखने वाले तत्व के रूप में देखा जाता रहा है। गर्मियों और मानसून के दौरान शरीर में होने वाले बदलावों को ध्यान में रखते हुए करेला, नीम, मेथी और कई तरह की कड़वी जड़ी-बूटियां भोजन का हिस्सा बनाई जाती थीं। यह परंपरा केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में अपने-अपने तरीके से आज भी जीवित है।
भारत के हर कोने में कड़वे स्वाद की अपनी खास पहचान
भारत की विविध खाद्य परंपराएं बताती हैं कि कड़वाहट को हमेशा स्वास्थ्य से जोड़ा गया है। अरुणाचल प्रदेश में बांस की कोपलों का उपयोग किया जाता है तो उत्तराखंड में बिच्छू घास यानी बिच्छुआ बूटी को पौष्टिक भोजन माना जाता है। मेघालय में कंटोला और उसकी पत्तियां लोकप्रिय हैं जबकि कोंकण क्षेत्र में अनार के छिलकों की चटनी बनाई जाती है। दक्षिण भारत में नीम के फूलों का इस्तेमाल कई पारंपरिक व्यंजनों में होता है और गुजरात तथा राजस्थान में नीम की कोमल पत्तियां भोजन का हिस्सा बनती हैं। भले ही स्वाद अलग-अलग हों लेकिन इन सभी का उद्देश्य शरीर को मौसम के अनुसार तैयार करना और रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाना है। आयुर्वेद में इसे ‘तिक्त रस’ कहा गया है और इसे शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालने तथा पाचन तंत्र को बेहतर बनाने में सहायक माना जाता है। यही कारण है कि भारतीय परंपराओं में कड़वे स्वाद को विशेष महत्व दिया गया है।
डायबिटीज और हार्ट हेल्थ में क्यों बढ़ रही है कड़वे खाद्य पदार्थों की अहमियत
आज दुनिया भर में डायबिटीज के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में करेला, मेथी और नीम जैसे खाद्य पदार्थों की उपयोगिता पर फिर से ध्यान दिया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि संतुलित आहार और स्वस्थ जीवनशैली के साथ ये खाद्य पदार्थ ब्लड शुगर मैनेजमेंट में सहायक हो सकते हैं। जब शरीर में ग्लूकोज और इंसुलिन का स्तर लंबे समय तक असंतुलित रहता है तो इसका असर केवल शुगर तक सीमित नहीं रहता बल्कि हृदय, आंखों, किडनी, लिवर, मस्तिष्क और जोड़ों पर भी पड़ सकता है। यही वजह है कि डायबिटीज को कई गंभीर बीमारियों की जड़ माना जाता है। सामान्य स्थिति में भोजन से पहले ब्लड शुगर 100 mg/dl से कम और भोजन के बाद 140 mg/dl से कम होना चाहिए। जबकि प्री-डायबिटीज और डायबिटीज की स्थिति में ये स्तर बढ़ जाते हैं, जिससे हार्ट अटैक और अन्य जटिलताओं का खतरा भी बढ़ सकता है। इसलिए खानपान में संतुलन और सही खाद्य पदार्थों का चुनाव बेहद जरूरी हो जाता है।
कड़वाहट में छिपा है बेहतर स्वास्थ्य का संदेश
आज जब लोग प्रोसेस्ड फूड, अत्यधिक चीनी और फास्ट फूड की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं, तब पारंपरिक भारतीय भोजन की अहमियत फिर से समझ में आने लगी है। वैश्विक वेलनेस इंडस्ट्री में ‘बिटर फूड्स’ यानी कड़वे खाद्य पदार्थ एक नए ट्रेंड के रूप में उभर रहे हैं। करेला, मेथी और नीम जैसे खाद्य पदार्थों में मौजूद प्राकृतिक तत्व पाचन क्रिया को बेहतर बनाने, मेटाबॉलिज्म को सपोर्ट करने और शरीर के संतुलन को बनाए रखने में मदद कर सकते हैं। हालांकि इन्हें किसी बीमारी का इलाज नहीं माना जाना चाहिए, लेकिन संतुलित आहार का हिस्सा बनाकर इनके लाभ लिए जा सकते हैं। शायद यही वजह है कि भारतीय परंपराओं ने सदियों पहले ही कड़वे स्वाद को भोजन में जगह दी थी। जीवन की तरह भोजन भी हमें यही सिखाता है कि हर कड़वी चीज बुरी नहीं होती। कई बार यही कड़वाहट शरीर को स्वस्थ रखने और जिंदगी में मिठास घोलने का काम करती है।
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