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जेईएस कॉलेज में विधिनाट्य शिबिर का रंगारंग समापन, लोककला संरक्षण की मिली प्रेरणा

जेईएस कॉलेज में विधिनाट्य शिबिर का रंगारंग समापन, लोककला संरक्षण की मिली प्रेरणा

जालना: “जब तक लोककला जीवित है, तब तक हमारी लोक संस्कृति सुरक्षित है” — यह प्रेरक विचार सुप्रसिद्ध सिनेनाट्य अभिनेता राजकुमार तांगडे ने जेईएस महाविद्यालय में आयोजित विधिनाट्य प्रशिक्षण शिविर के समापन अवसर पर व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि लोक कला का संरक्षण केवल सरकार या संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज के हर वर्ग की सहभागिता से ही इसकी समृद्धि संभव है।

यह विशेष शिबिर सांस्कृतिक कार्य संचालनालय, महाराष्ट्र राज्य, मुंबई के तत्वावधान में आयोजित किया गया था। कार्यक्रम का आयोजन जेईएस महाविद्यालय के चुन्नीलाल गिरीलाल सभागृह में किया गया, जिसमें शिवसेना जिलाप्रमुख भास्कर अंबेकर, जालना महानगरपालिका आयुक्त संतोष खांडेकर, लोक शाहिर आप्पासाहेब उगले तथा अध्यक्ष के रूप में प्राचार्य डॉ. गणेश अग्निहोत्री उपस्थित थे।

समारोह का शुभारंभ पारंपरिक दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इसके पश्चात आप्पासाहेब उगले ने शिविर के उद्देश्यों व महत्त्व पर प्रकाश डाला।

शिविर के दौरान विद्यार्थियों ने विधिनाट्य की विभिन्न पारंपरिक विधाओं में प्रशिक्षण प्राप्त किया और समापन समारोह में उनकी शानदार प्रस्तुतियों ने दर्शकों का मन मोह लिया।

संबल, डवर, टाल, तुंतूने जैसे पारंपरिक वाद्यों के साथ प्रस्तुत ‘गोंधल’ ने वातावरण को भक्ति भाव से भर दिया। ‘नमिला गजवदन सखा’ और ‘गोंधलाशी लवकरी ग आज यावे आंबे’ गीतों को खूब सराहा गया।

इसके बाद ‘भराड’ विधि की प्रस्तुति सोहम, प्रणव, आदित्य व हरीश ने की, जिसमें ‘माझे भैरवनाथ घोड्यावरी’ गीत विशेष भावनात्मक प्रभाव छोड़ गया।

वहीं खंडेराया जागरण की परंपरा को विश्वजीत, आनंद और स्वाती ने जीवंत किया, जिसमें ‘गण नमिला मल्हारी खंडेराया’ और ‘भंडाऱ्यांनी ओटी माझी भरली’ गीतों ने प्रेक्षागृह को आध्यात्मिकता से भर दिया।

कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण वासुदेव लोककला रहा, जिसे सोहम और ओंकार ने प्रस्तुत किया। ‘ऐका संतवाणी’ जैसे पदों ने सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश को प्रभावी ढंग से दर्शाया।

कार्यक्रम के मध्यांतर में प्रशिक्षणार्थियों को प्रमाणपत्र और ग्रंथ प्रदान कर सम्मानित किया गया। अतिथियों ने शिविर में प्रस्तुत लोक कलाओं की भूरी-भूरी प्रशंसा करते हुए कहा कि ऐसी पहलें लोककला के पुनर्जीवन की दिशा में अत्यंत आवश्यक हैं।

अंत में दुर्लभ लोकनाट्य ‘कडकलक्ष्मी’ या ‘लखा आईचा पोतराज’ की प्रस्तुति आनंद घुले ने पारंपरिक शैली में कर वातावरण को अलौकिक बना दिया।

समापन पर आप्पासाहेब उगले ने सभी उपस्थितों, विद्यार्थियों और सहयोगियों का आभार जताया। इस आयोजन की सफलता में कल्याण उगले, रामकिसन उगले और शाहीर रामानंद उगले का विशेष योगदान रहा।


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Imran Siddiqui

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