सुप्रीम कोर्ट ने मेधा पाटकर की मानहानि दोषसिद्धि को बरकरार रखा, जुर्माना माफ किया
नई दिल्ली, 11 अगस्त 2025
सुप्रीम कोर्ट ने आज सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर की 25 साल पुरानी मानहानि मामले में दोषसिद्धि को बरकरार रखा। यह मामला दिल्ली के उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना द्वारा दायर किया गया था। हालांकि, कोर्ट ने पाटकर पर लगाए गए ₹1 लाख के जुर्माने को माफ कर दिया और निगरानी आदेश को लागू न करने का निर्देश दिया।
मामला क्या था?
यह मामला वर्ष 2000 का है, जब पाटकर ने नर्मदा बचाओ आंदोलन के संदर्भ में एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की थी। सक्सेना, जो उस समय एक एनजीओ के प्रमुख थे, ने पाटकर के बयान को मानहानि मानते हुए अदालत में मामला दायर किया। सक्सेना ने आरोप लगाया कि पाटकर के बयान से उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है।
न्यायिक प्रक्रिया
- निचली अदालत (2024): दिल्ली की साकेत कोर्ट ने पाटकर को दोषी ठहराया और उन्हें 5 महीने की साधारण कारावास की सजा सुनाई। साथ ही, ₹10 लाख का जुर्माना भी लगाया गया।
- उच्च न्यायालय (2025): दिल्ली उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा, लेकिन पाटकर को तीन महीने में एक बार अदालत में उपस्थित होने की शर्त में आंशिक राहत दी।
- सुप्रीम कोर्ट: सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के फैसले को स्वीकार किया, लेकिन जुर्माने को माफ कर दिया और निगरानी आदेश को लागू न करने का निर्देश दिया।
कानूनी दृष्टिकोण
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पाटकर के बयान में मानहानि के सभी तत्व मौजूद थे, जैसे कि बयान का सार्वजनिक रूप से प्रसार, विशिष्टता, और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना। हालांकि, जुर्माने में छूट और निगरानी आदेश की शिथिलता से पाटकर को आंशिक राहत मिली है।
निष्कर्ष
यह मामला मानहानि कानून की जटिलताओं और सार्वजनिक हस्तियों के अधिकारों के बीच संतुलन को दर्शाता है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों में मार्गदर्शन प्रदान करेगा।
Main Points (English)
- The Supreme Court upheld social activist Medha Patkar’s conviction in a 25-year-old criminal defamation case filed by Delhi Lieutenant Governor V.K. Saxena.
- The case originated from a 2000 press release by Patkar related to the Narmada Bachao Andolan, which Saxena claimed defamed him.
- A Delhi lower court sentenced Patkar to 5 months imprisonment and imposed a ₹10 lakh fine.
- The Delhi High Court upheld the conviction but provided partial relief by modifying some conditions.
- The Supreme Court maintained the conviction but waived the ₹1 lakh penalty and refused to enforce the supervision order.
- The judgment highlights the complexity of defamation law and the balance between freedom of expression and protecting reputations.
- This decision may guide future defamation cases involving public figures and activists.

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