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सिर्फ पंजीकरण से नहीं बदलती संस्था की सार्वजनिक ट्रस्ट की पहचान: सुप्रीम कोर्ट

सिर्फ पंजीकरण से नहीं बदलती संस्था की सार्वजनिक ट्रस्ट की पहचान: सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

नई दिल्ली, 5 अगस्त 2025:
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सार्वजनिक हित और पारदर्शिता से जुड़ा एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि अगर कोई संस्था पहले से सार्वजनिक हित में कार्य कर रही है और उसके उद्देश्यों, संचालन एवं वित्तीय स्रोतों का स्वरूप “पब्लिक ट्रस्ट” यानी सार्वजनिक न्यास जैसा है, तो केवल सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 के तहत पंजीकरण कराने से उसकी ट्रस्ट की कानूनी पहचान समाप्त नहीं हो जाती।

इस फैसले का सीधा असर उन हजारों स्वयंसेवी संस्थाओं, NGO और चैरिटेबल सोसाइटीज़ पर पड़ेगा, जो जनकल्याण के उद्देश्यों से कार्य करती हैं और अपने ढांचे को सिर्फ “सोसाइटी” के रूप में पेश करती हैं।

⚖️ मामला: ऑपरेशन आशा बनाम डॉ. शैली बत्रा व अन्य

इस निर्णय का संदर्भ ‘ऑपरेशन आशा’ नामक एक चिकित्सा सेवाओं से जुड़ी संस्था और उसकी सह-संस्थापक डॉ. शैली बत्रा के बीच उत्पन्न विवाद से है।
डॉ. बत्रा को संस्था से हटा दिया गया था, जिसके बाद उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट में एक प्रतिनिधि वाद (Representative Suit) दायर किया। इसमें उन्होंने संस्था में वित्तीय अनियमितता, उद्देश्यों से भटकाव और संचालन में अपारदर्शिता जैसे आरोप लगाए।

दिल्ली हाईकोर्ट ने उनके वाद को स्वीकार कर लिया, और माना कि संस्था अपने स्वरूप में एक “constructive trust” यानी व्यवहारिक रूप से एक सार्वजनिक ट्रस्ट जैसी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय को बरकरार रखते हुए कहा कि सिर्फ पंजीकरण संस्था की वास्तविक प्रकृति को नहीं बदलता।

🧾 सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा:

“अगर कोई संस्था अपने उद्देश्यों, गतिविधियों और वित्त पोषण के आधार पर सार्वजनिक कल्याण के लिए काम कर रही है — जैसे शिक्षा, चिकित्सा, सामाजिक सुधार आदि — तो उसे सार्वजनिक ट्रस्ट के रूप में देखा जाएगा, भले ही वह तकनीकी रूप से एक सोसाइटी के रूप में पंजीकृत हो।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत पंजीकरण संस्था को “निजी संस्था” का रूप नहीं दे देता, यदि वह पहले से दान, सरकारी अनुदान और जनसहयोग से जनहित में कार्यरत रही हो।

⚖️ धारा 92 CPC के अंतर्गत प्रतिनिधि वाद संभव

यह निर्णय इस दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है कि सुप्रीम कोर्ट ने CPC की धारा 92 के तहत ऐसे संस्थाओं के विरुद्ध प्रतिनिधि वाद की स्वीकृति को वैध ठहराया है। इसका अर्थ यह है कि यदि संस्था में कदाचार, भ्रष्टाचार या उद्देश्यों से भटकाव होता है, तो नागरिक न्यायालय में कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

🔍 इस फैसले का व्यापक प्रभाव

  • NGO और सोसाइटीज़ की जवाबदेही बढ़ेगी: अब वे संस्थाएं, जो दान और सरकारी सहायता के बल पर जनहित में कार्य कर रही हैं, उनके खिलाफ ट्रस्ट उल्लंघन की कानूनी कार्रवाई संभव होगी।
  • संस्थाओं की पारदर्शिता पर न्यायिक नियंत्रण: केवल संस्था का “सोसाइटी” पंजीकरण उसे सार्वजनिक उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं करेगा।
  • पूर्व की गतिविधियों का मूल्यांकन प्राथमिक: कोर्ट यह देखेगा कि संस्था की स्थापना से पहले और बाद की गतिविधियां ट्रस्ट जैसे स्वरूप में थीं या नहीं।
  • संवेदनशील मामलों में राहत का मार्ग खुला: संस्थाओं से निष्कासित व्यक्ति, ट्रस्टी, हितधारक या अन्य इच्छुक पक्ष अब कोर्ट में प्रतिनिधि वाद के ज़रिये न्याय की मांग कर सकते हैं।

🧠 निष्कर्ष

इस ऐतिहासिक फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि भारत की न्यायपालिका केवल तकनीकी प्रक्रियाओं पर नहीं, बल्कि संस्थाओं की वास्तविक गतिविधियों और उद्देश्यों को आधार बनाकर न्याय करेगी। यह निर्णय ट्रस्ट, सोसाइटी और चैरिटेबल संस्थाओं की जवाबदेही तय करने की दिशा में एक मजबूत कदम है।

अब अगर कोई संस्था जनहित के नाम पर सहायता प्राप्त कर रही है, तो वह कानून की नजर में सिर्फ एक “सोसाइटी” नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक ट्रस्ट मानी जा सकती है — और उस पर वैसी ही जिम्मेदारी लागू होगी।


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