सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी के साथ रहने की शर्त पर दी गई अग्रिम जमानत को रद्द किया, कहा – वैवाहिक संबंधों को लेकर शर्तें असंवैधानिक
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट के एक आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट किया है कि अग्रिम जमानत के लिए ऐसी कोई शर्त नहीं लगाई जा सकती, जिसमें पति को पत्नी के साथ वैवाहिक जीवन फिर से शुरू करने और उसे “सम्मान और मर्यादा के साथ” रखने के लिए बाध्य किया जाए। अदालत ने इस तरह की शर्त को आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 438(2) के अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया।
यह मामला अनिल कुमार बनाम राज्य बनाम झारखंड और एक अन्य से संबंधित है, जिसमें याचिकाकर्ता पर भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए (दहेज उत्पीड़न), 323 (चोट पहुंचाना), 313 (गर्भपात कराने के लिए मजबूर करना), 506 (आपराधिक धमकी), 307 (हत्या का प्रयास) और 34 (सामूहिक आपराधिक इरादा) सहित गंभीर धाराओं और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत आरोप लगाए गए थे।
झारखंड हाईकोर्ट ने आरोपी को अग्रिम जमानत देते हुए शर्त रखी थी कि वह अपनी पत्नी के साथ वैवाहिक जीवन बहाल करे और उसे पत्नी के रूप में “सम्मान और गरिमा” के साथ रखे। इसी शर्त को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ए. जी. मसीह शामिल थे, ने स्पष्ट रूप से कहा कि अदालतें जमानत के निर्णय के समय केवल कानून में निर्धारित मानकों और मापदंडों के आधार पर ही विचार कर सकती हैं। वैवाहिक जीवन को फिर से शुरू करना या संबंधों को सुधारना किसी भी स्थिति में जमानत की शर्त नहीं हो सकती।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि इस प्रकार की शर्तें आगे चलकर नए विवादों और कानूनी प्रक्रियाओं को जन्म दे सकती हैं। यदि पति द्वारा शर्त का पालन नहीं किया गया तो यह स्थिति जमानत रद्द करने की मांग का कारण बन सकती है। यह न केवल न्यायिक प्रक्रिया को जटिल बनाएगा, बल्कि एक पक्ष को अनावश्यक कानूनी दबाव में भी डालेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट के आदेश को पूरी तरह से निरस्त करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता की अग्रिम जमानत याचिका पर एक बार फिर “मूल तथ्यों” और “कानूनी आधारों” पर पुनर्विचार किया जाए। साथ ही, कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि जब तक हाईकोर्ट दोबारा निर्णय नहीं देता, तब तक आरोपी को गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा प्राप्त रहेगी।
महत्वपूर्ण कानूनी संकेत:
यह फैसला उन सभी मामलों के लिए एक मार्गदर्शक बन सकता है जहां वैवाहिक विवादों को आपराधिक मुकदमों के दौरान जमानत की शर्तों से जोड़ दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक शब्दों में कहा है कि अदालतों को वैवाहिक अधिकार, वैवाहिक संबंध या conjugal obligations जैसे निजी विषयों को जमानत के साथ नहीं जोड़ना चाहिए, क्योंकि इससे न्यायिक प्रणाली का दुरुपयोग हो सकता है।
न्यायपालिका का संतुलित दृष्टिकोण:
अदालत ने यह भी दोहराया कि यद्यपि वैवाहिक संबंधों में मेल-मिलाप या सुलह की भावना को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, लेकिन वह केवल वैधानिक और स्वैच्छिक प्रक्रियाओं के माध्यम से ही हो सकता है, न कि जमानत की बाध्यकारी शर्तों द्वारा।

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