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ईसाई धर्म अपनाने के बाद आरक्षण नहीं — मद्रास हाईकोर्ट ने अमुथा राणी को नगराध्यक्ष पद से किया अयोग्य घोषित

ईसाई धर्म स्वीकारने के बाद अनुसूचित जाति आरक्षण का लाभ नहीं — अमुथा राणी को मद्रास हाईकोर्ट ने नगराध्यक्ष पद से किया अयोग्य घोषित

चेन्नई | विशेष न्याय संवाददाता

तमिलनाडु की थेरूर नगर पंचायत में नगराध्यक्ष पद को लेकर एक ऐतिहासिक निर्णय देते हुए मद्रास उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि ईसाई धर्म (Christianity) अपनाने के बाद कोई भी व्यक्ति अनुसूचित जाति (SC) के तहत आरक्षण का लाभ नहीं उठा सकता। अदालत ने इस आधार पर अण्णाद्रमुक नेता अमुथा राणी को अयोग्य घोषित करने के निर्देश जारी किए हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह याचिका वी. अय्यप्पन द्वारा दायर की गई थी जिन्होंने 2022 की नगर पंचायत चुनाव में डीएमके प्रत्याशी के रूप में अनुसूचित जाति (सामान्य) के लिए आरक्षित वार्ड से चुनाव जीतकर पार्षद पद प्राप्त किया। वहीं अमुथा राणी ने महिला (सामान्य) के लिए आरक्षित वार्ड 2 से चुनाव जीतकर नगरसेविका बनीं।

14 मार्च 2022 को हुए अप्रत्यक्ष चुनाव में नगराध्यक्ष पद अनुसूचित जाति (सामान्य) के लिए आरक्षित था, जिसमें अमुथा राणी ने भी नामांकन दाखिल किया और उन्हें चुना गया। लेकिन याचिकाकर्ता ने अदालत में तर्क दिया कि अमुथा राणी ने वर्ष 2005 में ईसाई युवक वी. विन्सेंट से ईसाई रीति-रिवाज़ से विवाह कर ख़ुद ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था।

न्यायालय की सख्त टिप्पणी

न्यायमूर्ति एल. विक्टोरिया गौरी ने निर्णय देते हुए कहा —

“जब कोई व्यक्ति स्वेच्छा से ईसाई धर्म स्वीकार करता है, तो वह अनुसूचित जाति के आरक्षण का लाभ नहीं ले सकता। भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम, 1872 के अंतर्गत विवाह करने के बाद अमुथा राणी अब स्वयं को हिंदू नहीं कह सकतीं। यह संविधान की भावना के साथ धोखा है।”

इस आधार पर अदालत ने अमुथा राणी को नगराध्यक्ष पद के लिए अयोग्य घोषित करने के निर्देश संबंधित अधिकारियों को दिए।

महत्वपूर्ण तथ्य:

  • अनुसूचित जाति आरक्षण का लाभ केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अनुयायियों को मिलता है।
  • धर्मांतरण के बाद SC आरक्षण पाना संवैधानिक रूप से अमान्य है।
  • यह निर्णय भविष्य में धर्मांतरण बनाम आरक्षण विवादों के लिए एक मिसाल बन सकता है।

निष्कर्ष

यह मामला न केवल व्यक्तिगत पहचान और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा है, बल्कि भारत की आरक्षण नीति और संविधान की मूल भावना से भी टकराव को दर्शाता है। इस निर्णय से यह स्पष्ट हो गया है कि आरक्षण का लाभ लेने के लिए धर्म का चयन एक गंभीर संवैधानिक मामला है।


© http://www.newsnationonline.com | यह लेख संविधान, धर्मांतरण और आरक्षण पर चल रहे सार्वजनिक विमर्श में नई रोशनी डालता है।

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Imran Siddiqui

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