राफेल डील पर छाया संकट, भारत की रक्षा नीति में रूसी मोड़ — SU-57, S-500 और ‘कावेरी’ पर रूस बना नया साझेदार
समाचार विश्लेषण | नई दिल्ली/पेरिस/मॉस्को | अपडेटेड: 27 मई 2025
भारत की आत्मनिर्भर रक्षा रणनीति एक नए मोड़ पर खड़ी है। फ्रांस की डसॉल्ट एविएशन कंपनी द्वारा राफेल फाइटर जेट्स का सोर्स कोड साझा करने से इनकार के बाद भारत ने अपनी रक्षा साझेदारियों की पुनर्समीक्षा शुरू कर दी है। ऐसे में रूस का पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर SU-57 एक संभावित विकल्प बनकर उभरा है।
‘सोर्स कोड’ की बंदिशें: भारत की चिंता
राफेल जेट्स में भारतीय मिसाइल प्रणाली, रडार और सेटेलाइट नेटवर्क को जोड़ने के लिए भारत को हर बार फ्रांस की मंजूरी लेनी पड़ती है। यह तकनीकी निर्भरता भारत की ‘आत्मनिर्भर भारत’ नीति के खिलाफ है और रणनीतिक संप्रभुता को भी प्रभावित करती है।
रूस का प्रस्ताव: टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और भारत में निर्माण
रूस ने भारत को SU-57 की बिक्री के साथ-साथ भारत में निर्माण और तकनीकी हस्तांतरण का प्रस्ताव दिया है। यह फाइटर स्टील्थ टेक्नोलॉजी, सुपरक्रूज क्षमता और उच्च मैन्युवरिबिलिटी जैसी खूबियों से लैस है। SU-30MKI की मौजूदा उत्पादन इकाइयों से ही SU-57 का निर्माण शुरू किया जा सकता है।
कावेरी इंजन और रूस की भूमिका
जब फ्रांस ने भारत के ‘कावेरी टर्बोफैन इंजन’ में सहयोग देने से मना कर दिया, तब रूस ने इसे अपने इल्यूशिन-76 विमान पर टेस्ट करने की अनुमति दी। यह इंजन भविष्य के भारतीय फाइटर प्रोजेक्ट्स के लिए बेहद अहम है।
राफेल मरीन डील पर मंडराता संकट
भारत की 26 राफेल मरीन जेट्स की डील अब खतरे में है। फ्रांस के रवैये ने इस डील को भविष्य की ज़रूरतों के अनुसार कस्टमाइज करने की संभावनाओं पर प्रश्न खड़ा कर दिया है। मिराज-2000 के मामले में भी भारत को दशकों तक यही समस्या झेलनी पड़ी थी।
S-500: एयर डिफेंस की नई पीढ़ी
रूस ने भारत को S-500 एयर डिफेंस सिस्टम की पेशकश की है, जो भविष्य की हाइपरसोनिक मिसाइल खतरों से बचाव के लिए एक उन्नत विकल्प है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की रूस यात्रा के दौरान इस पर महत्वपूर्ण वार्ता हो सकती है।
निष्कर्ष:
भारत अब केवल रक्षा उपकरण नहीं, बल्कि पूर्ण तकनीक हस्तांतरण और स्थानीय निर्माण की दिशा में सोच रहा है। फ्रांस की सीमाओं ने भारत को रूस की ओर झुकने पर मजबूर किया है, जो तकनीकी साझेदारी के लिए अधिक सहायक और लचीला नजर आता है।

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