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आईएसआईएस से संबंधों के आरोप में जमानत खारिज: सुप्रीम कोर्ट बोला— “समाज को संदेश देने का यही सही समय”

आईएसआईएस से संबंधों के आरोप में जमानत याचिका खारिज — सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “समाज को संदेश देने का यही सही समय”

अपडेट: 11 नवंबर 2025 (मंगलवार)

सुप्रीम कोर्ट ने आईएसआईएस विचारधारा को बढ़ावा देने और आतंकी साजिश में शामिल होने के आरोपित एक व्यक्ति की जमानत याचिका मंगलवार को खारिज कर दी। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने फैसले को समाज में “कड़ा और आवश्यक संदेश” देने वाला बताया।

“समाज को संदेश देने का यही सर्वोत्तम समय है।”

— न्यायमूर्ति संदीप मेहता, सुनवाई के दौरान

नोटरी एसोसिएशन के कार्यकारी अध्यक्ष एड. महेश एस. धन्नावत ने निर्णय का स्वागत करते हुए कहा, “देश की सुरक्षा के लिए ऐसे कठोर कदम बेहद जरूरी हैं… यह हमारे न्याय तंत्र की आतंकवाद के प्रति शून्य-सहिष्णुता की नीति को स्पष्ट करता है।”

मामले की पृष्ठभूमि

  • आरोपी पर आईएसआईएस से जुड़े होने और “फिसाबिलिल्लाह” नामक व्हाट्सऐप ग्रुप बनाने का आरोप; ग्रुप डीपी कथित तौर पर आईएसआईएस के झंडे जैसा था।
  • जबलपुर ऑर्डनेंस फैक्ट्री पर हमला कर हथियार हासिल करने की कथित साजिश।
  • मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 6 जनवरी 2025 को NIA कोर्ट की जमानत अस्वीकृति को बरकरार रखा; इसके विरुद्ध आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ

“आप पर देश में आतंक का जाल फैलाने का आरोप है… यूएपीए के अंतर्गत ‘तैयारी करना’ भी अपराध है।”

— खंडपीठ की मौखिक टिप्पणी

अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद भड़काऊ सामग्री का उल्लेख किया और कहा कि आरोपी के खिलाफ प्रथमदृष्ट्या गंभीर आरोप सिद्ध होते हैं। बचाव पक्ष ने आरोपी के 70% दिव्यांग होने और दो वर्ष से अधिक समय से जेल में निरुद्ध रहने का मुद्दा उठाया, किंतु कोर्ट ने जमानत देने से इनकार कर दिया।

ट्रायल की समयसीमा और प्रगति

निर्देश: सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को मुकदमा दो वर्षों के भीतर पूरा करने के लिए कहा।

स्थिति: अभी तक 94 में से 19 गवाहों की गवाही हो चुकी है।

महत्वपूर्ण स्पष्टता: यदि आरोपी की गलती के बिना मुकदमा तय समय में पूरा नहीं हो पाता, तो वह दोबारा जमानत के लिए आवेदन कर सकता है।

क्यों मायने रखता है

  • यूएपीए के तहत “तैयारी” को भी अपराध मानने पर सुप्रीम कोर्ट का पुन: जोर।
  • आतंकवाद मामलों में डिटरेंस (निवारण) के सिद्धांत पर अदालत का सख्त रुख।
  • तेज़ ट्रायल के लिए समयबद्ध निर्देश, ताकि लंबित मामलों में देरी कम हो।

Advocate Mahesh Dhannawat

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Rashmi Bagdi
Rashmi Bagdi is a journalist and digital content creator associated with NewsNation Online. She specializes in reporting on local news, civic issues, education, government updates, and viral stories with a reader-focused approach.

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