जमीन मां के समान, उसका अधिग्रहण अत्यंत पीड़ादायक: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट की टिप्पणी ने महाराष्ट्र के किसानों की लड़ाई को दिया संबल
मुंबई/जालना: आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने भूमि अधिग्रहण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि भूमि को समाज में माँ के समान समझा जाता है और उसे खोना परिवार के लिए अत्यंत पीड़ादायक होता है। न्यायालय के इस बयान ने महाराष्ट्र, विशेषकर जालना जिले में समृद्धि महामार्ग के कनेक्टर के लिए हो रहे भूमि अधिग्रहण के विरोध को नया कानूनी और भावनात्मक आधार प्रदान किया है।
मामले की पृष्ठभूमि और हाईकोर्ट का अवलोकन
आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय की खंडपीठ — न्यायमूर्ति बट्टू देवानंद और न्यायमूर्ति ए. हरी हरनाध शर्मा — ने “स्टेट ऑफ आंध्र प्रदेश बनाम राजोला जगन्नाध रेड्डी एवं अन्य” (रिट अपील क्र. 356/2023) के निर्णय में कहा कि जब सरकार सार्वजनिक आवश्यकता के लिए भूमि अधिग्रहित करती है, तो विस्थापित परिवार के किसी सदस्य को रोजगार देने और अन्य आश्वासनों को पूरा करना सरकार की जिम्मेदारी होती है; ये वादे केवल कागज़ों तक सीमित नहीं रहने चाहिए।
न्यायालय ने यह भी कहा कि भूमि के साथ लोगों का गहरा भावनात्मक जुड़ाव होता है और यदि सरकारी वादों को समय पर पूरा नहीं किया गया तो लोकविश्वास टूटता है तथा असंतोष बढ़ता है।
एडवोकेट महेश एस. धन्नावत की प्रतिक्रिया
नोटरी एसोसिएशन, जालना के कार्याध्यक्ष एडवोकेट महेश एस. धन्नावत ने इस टिप्पणी का स्वागत करते हुए कहा कि किसानों के लिए जमीन केवल आय का स्रोत नहीं, बल्कि उनकी पहचान और जीवन-आधार है। उन्होंने कहा—
“जमीन छिनते ही किसान और उसका परिवार अस्तित्व के संकट से जूझते हैं। यह निर्णय देशभर के किसानों की पीड़ा को न्यायालय द्वारा स्वीकार करने जैसा है।”
— एडवोकेट महेश एस. धन्नावत
जालना जिले के किसानों का संघर्ष
धन्नावत ने कहा कि जालना में समृद्धि महामार्ग के कनेक्टर के लिए भूमि अधिग्रहण में असमानता दिखाई दे रही है। जहां मुख्य समृद्धि महामार्ग के लिए किसानों को अपेक्षाकृत अच्छा मुआवजा मिला, वहीं कनेक्टर मार्ग के लिए जालना के किसानों की जमीनें बहुत कम दाम पर अधिग्रहित की जा रही हैं।
- किसानों का आरोप है कि अधिग्रहण महाराष्ट्र हाईवे अधिनियम, 1955 के तहत हो रहा है, जिसके कारण मुआवजा कम है।
- किसानों की मांग है कि अधिग्रहण भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 के अनुसार हो—जिसमें उचित मुआवजा, पुनर्वास तथा सामाजिक प्रभावों की व्यवस्था शामिल है।
किसानों का दावा है कि जहां जमीन का वास्तविक बाजार मूल्य 1–1.5 करोड़ रुपये प्रति एकड़ है, उन्हें मात्र 20–25 लाख रुपये प्रति एकड़ का मुआवजा दिया जा रहा है—जिसे वे अन्यायपूर्ण मानते हैं।
संघर्ष की तीव्रता और निष्कर्ष
जालना, नांदेड और परभणी जिलों के किसानों ने सड़क बंद, धरने और प्रदर्शन कर के अपनी आवाज़ उठाई है। आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का यह निर्णय भूमि अधिग्रहण की केवल क़ानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि उसके मानवीय और भावनात्मक पहलू को भी समझने का आह्वान करता है।
निष्कर्ष: जालना के किसानों की लड़ाई केवल मुआवजे की नहीं, बल्कि सम्मान, पहचान और जीवन-आधार की रक्षा की लड़ाई है। जब तक सरकार संवेदनशीलता के साथ किसानों की वैध मांगों का समाधान नहीं करेगी, यह संघर्ष जारी रहने की आशंका बनी रहेगी।

Dhannawat Law Associates
Adv. Mahesh S. Dhannawat
B.Com, LL.M, G.D.C. & A.
Ex-Vice President, Jalna District Bar Association
Mob.: 9326704647 / 02482-233581
Email: dhannawat.mahesh@gmail.com
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