जालना के अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने आर्थिक लेनदेन में धोखाधड़ी के एक मामले में बिल्डर अनुजकुमार सारस्वत को दोषी ठहराते हुए एक महीने की साधारण कैद की सज़ा सुनाई है। इसके साथ ही अदालत ने उन्हें शिकायतकर्ता को ₹3 लाख 40 हजार रुपये क्षतिपूर्ति के रूप में अदा करने का आदेश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

अदालत में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार, आरोपी अनुजकुमार सारस्वत ने व्यावसायिक उपयोग के लिए शारदा गिल्डा से को ₹2 लाख 50 हजार रुपये उधार लिए थे। इस राशि की वापसी के लिए उन्होंने को चिखली अर्बन बैंक, जालना शाखा का चेक दिया। लेकिन बैंक ने चेक अस्वीकार कर दिया क्योंकि खाते में पर्याप्त राशि नहीं थी।

इसके बाद शिकायतकर्ता द्वारा कानूनी नोटिस भेजे जाने के बावजूद भी आरोपी ने रकम का भुगतान नहीं किया। नतीजतन, शारदा गिल्डा ने अदालत में मामला दर्ज कराया। सुनवाई के दौरान शारदा गिल्डा के पावर ऑफ अटॉर्नी मनोज गिल्डा और बैंक कर्मचारी मनोज गर्जे की गवाही निर्णायक सिद्ध हुई।

न्यायालय का निर्णय

अतिरिक्त मुख्य न्यायाधीश करीम खान ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद सर्वोच्च न्यायालय के ‘आलवी हाजी बनाम पल्लापेट्टी मोहम्मद’ प्रकरण के निर्णय का संदर्भ लेते हुए अनुजकुमार सारस्वत को दोषी ठहराया।

न्यायालय ने कहा कि आरोपी को एक महीने की सज़ा भुगतनी होगी और ली गई रकम सहित कुल ₹3.40 लाख रुपये शिकायतकर्ता को लौटाने होंगे।

इस मामले में अधिवक्ता संजय देशपांडे ने शिकायतकर्ता की ओर से पैरवी की।

न्यायालय की टिप्पणी: आर्थिक लेनदेन में विश्वास बनाए रखना आवश्यक

“भारत सरकार का उद्देश्य आर्थिक लेनदेन में धनादेश (चेक) आधारित प्रणाली पर जनता का विश्वास मजबूत करना है। इसलिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 और 139 के तहत कानूनी गृहीतकों को प्रभावी रूप से लागू करना आवश्यक है। अन्यथा जनता का विश्वास चेक लेनदेन प्रणाली से उठ सकता है।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हस्ताक्षरित धनादेश को कानूनी देयक की धारणा के अंतर्गत माना जाएगा। यह निर्णय आर्थिक अनुशासन और पारदर्शिता को मजबूत करने वाला है।

मनोज गिल्डा ने कहा कि “इस निर्णय से आम नागरिकों में आर्थिक लेनदेन को लेकर भरोसा और अधिक सुदृढ़ होगा।”