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तफ्तीश में अनिश्चित देरी आरोपी के अधिकारों का उल्लंघन — सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले पर एडवोकेट महेश धन्नावत की प्रतिक्रिया

तफ्तीश में अनिश्चित देरी आरोपी के अधिकारों का उल्लंघन — एडवोकेट महेश धन्नावत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बताया न्याय व्यवस्था का ऐतिहासिक पड़ाव

जालना — सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि आपराधिक मामलों की जांच में अनिश्चित और अत्यधिक देरी करना आरोपी के मौलिक अधिकारों — विशेषकर अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार — का गंभीर उल्लंघन है। इस महत्वपूर्ण फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए नोटरी एसोसिएशन जालना के कार्याध्यक्ष एडवोकेट महेश धन्नावत ने इसे भारतीय न्याय प्रणाली का “मील का पत्थर” बताते हुए कहा कि यह निर्णय छत्रपति शिवाजी महाराज की त्वरित और निष्पक्ष न्याय व्यवस्था की याद दिलाता है।

20 नवंबर 2025 को न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटीश्वर सिंह की खंडपीठ ने ‘रॉबर्ट लालचुंगनंगा चोंगथू बनाम बिहार सरकार’ मामले में फैसला सुनाया। इस मामले में एक IAS अधिकारी के खिलाफ 11 वर्षों तक पूरक आरोपपत्र दाखिल नहीं किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इसे गंभीर लापरवाही मानते हुए संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा —

“किसी भी आरोपी को अनिश्चितकाल तक जांच के नाम पर भय और मानसिक तनाव में नहीं रखा जा सकता।”

“शिवाजी महाराज के न्याय सिद्धांतों की याद” — एड. महेश धन्नावत

एडवोकेट धन्नावत ने कहा कि यह निर्णय जांच एजेंसियों की मनमानी पर कड़ा नियंत्रण स्थापित करेगा। उन्होंने कहा:

“शिवाजी महाराज के शासनकाल में न्याय त्वरित, निष्पक्ष और पारदर्शी था। न पीड़ित और न आरोपी — किसी को भी वर्षों तक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती थी। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उसी न्याय–परंपरा की आधुनिक पुनर्पुष्टि है।”

उन्होंने शिवाजी महाराज के सिंहासन के समीप रखे ‘सुनहरे तराजू’ का उल्लेख करते हुए बताया कि यह न्याय में निष्पक्षता और संतुलन का प्रतीक था। रांझा के पाटिल द्वारा एक महिला पर अत्याचार की घटना पर शिवाजी महाराज द्वारा तत्काल कठोर दंड दिए जाने का उदाहरण देते हुए उन्होंने जोर दिया —

“देरी से न्याय, न्याय नहीं होता।”

सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्देश

  • न्यायालय ‘फंक्टस ऑफिशियो’ नहीं होता — धारा 173(8) CrPC के तहत आगे की जांच की अनुमति मिलने के बाद भी न्यायालय की निगरानी समाप्त नहीं होती।
  • जांच में देरी का वैध स्पष्टीकरण ज़रूरी — FIR और आरोपपत्र के बीच लंबी देरी होने पर जांच एजेंसी को ठोस कारण बताना अनिवार्य है।
  • उच्च न्यायालय में राहत का अधिकार — अनुचित देरी होने पर नागरिक भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 528 (पूर्व 482 CrPC) के तहत जांच रद्द कराने की मांग कर सकते हैं।
  • अनुच्छेद 21 का संरक्षण — तेज, निष्पक्ष जांच एवं ट्रायल जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है।

“न्याय के लिए नई आशा” — एड. धन्नावत

एडवोकेट धन्नावत ने कहा:

“यह फैसला सिर्फ एक अधिकारी तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे देश के आम नागरिकों के लिए आशा की किरण है। वर्षों तक लंबी और अनिश्चित जांच से पीड़ित लोगों को अब न्यायिक सुरक्षा मिलेगी। शिवराय के शासन में जैसे जनता को त्वरित न्याय का भरोसा था, आज की न्यायव्यवस्था में वह विश्वास इस निर्णय से और मजबूत हुआ है।”

Advocate Mahesh Dhannawat Jalna

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Rashmi Bagdi
Rashmi Bagdi is a journalist and digital content creator associated with NewsNation Online. She specializes in reporting on local news, civic issues, education, government updates, and viral stories with a reader-focused approach.

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