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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला — बिल की संवैधानिकता पर अंतिम राय सिर्फ न्यायालय का अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने तय की विधेयकों की संवैधानिक प्रक्रिया — राष्ट्रपति और राज्यपाल की भूमिका सीमित

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी बिल की संवैधानिकता (Constitutionality of Bill) पर अंतिम राय देने का अधिकार केवल न्यायालयों (Courts) को है। इस फैसले के बाद केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका (Review Petition) दाखिल करने की तैयारी कर रही है।

क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?

कोर्ट ने कहा कि यदि किसी विधेयक में संवैधानिक सवाल उठते हैं तो उसे राष्ट्रपति के माध्यम से अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट में भेजा जाना चाहिए। कार्यपालिका को इस मामले में स्वयं निर्णय देने से बचना चाहिए।

तमिलनाडु विवाद से जुड़ा मामला

यह टिप्पणी उस फैसले में आई है जिसमें तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि द्वारा 10 विधेयकों को रोकने को सुप्रीम कोर्ट ने अवैध और मनमाना करार दिया है।

अब बिल पर निर्णय में देरी नहीं

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यदि कोई बिल दोबारा विधानसभा से पास होकर राष्ट्रपति या राज्यपाल के पास जाता है तो उन्हें तीन महीने के भीतर निर्णय देना होगा। अन्यथा यह न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे में आ जाएगा।

राष्ट्रपति और राज्यपाल की सीमित भूमिका

  • संवैधानिक मुद्दों पर कोर्ट की राय जरूरी।
  • नीतिगत मामलों में सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप नहीं करेगा।
  • अनुच्छेद 143 की राय बाध्यकारी नहीं लेकिन उच्च प्रेरक मूल्य रखती है।
  • राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा बिल रोकने के स्पष्ट कारण जरूरी।

सरकार की आपत्ति और रिव्यू याचिका

सरकार का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से मंत्रिपरिषद और राष्ट्रपति के अधिकारों में कटौती हुई है। इसलिए सरकार जल्द ही इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल करेगी।

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Imran Siddiqui

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