हिमाचल पर मंडराता खतरा: सुप्रीम कोर्ट की पर्यावरण को लेकर चेतावनी
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश में अनियंत्रित विकास, अंधाधुंध निर्माण और पर्यावरणीय उपेक्षा पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि यदि वर्तमान हालात नहीं बदले, तो “पूरा हिमाचल प्रदेश देश के नक्शे से गायब हो सकता है।”
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और आर. महादेवन की पीठ ने *प्रिस्टिन होटल्स एंड रिसॉर्ट्स प्रा. लि.* की याचिका को खारिज करते हुए की। कंपनी ने तारा माता हिल को ‘ग्रीन एरिया’ घोषित करने की अधिसूचना को चुनौती दी थी, जिससे निजी निर्माण प्रतिबंधित हो गया था।
मुख्य चिंताएं
- राजस्व कमाना ज़रूरी है, लेकिन पर्यावरण की कीमत पर नहीं।
- चार लेन राजमार्ग, सुरंग, हाइड्रो प्रोजेक्ट, रोपवे और शहरी विस्तार ने भूस्खलन और अस्थिरता को बढ़ावा दिया है।
- अवैध पेड़ कटाई और वनकर्मियों की पोस्टिंग में कटौती ने आपदाओं को आम बना दिया है।
- कोर्ट ने स्पष्ट किया: “यह सब प्राकृतिक नहीं, बल्कि मानवजनित आपदाएं हैं।”
सरकारों को निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका (PIL) दर्ज की है और हिमाचल सरकार को 4 सप्ताह में पर्यावरणीय संरक्षण की विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है। अगली सुनवाई 25 अगस्त 2025 को होगी।
पर्यावरण से समझौता नहीं
न्यायालय ने कहा कि हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में आर्थिक लाभ के लिए प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ना खतरनाक है। हिमाचल का लगभग 66% हिस्सा वन क्षेत्र है, जिसे संरक्षित करना राज्य और केंद्र की जिम्मेदारी है।
यह निर्णय पर्यावरणीय न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक चेतावनी मानी जा रही है, जिसका असर पर्यटन, अवसंरचना और विकास नीति पर पड़ेगा।

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