रूह अफजा: ताजगी, परंपरा, और विवादों की कहानी
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उत्पत्ति: यूनानी चिकित्सा का तोहफा
1906 में दिल्ली के चांदनी चौक में हकीम हाफिज अब्दुल मजीद ने यूनानी चिकित्सा के सिद्धांतों से रूह अफजा तैयार किया। यह शरबत गर्मी से राहत, पाचन सुधार और शरीर को ऊर्जा देने के लिए बनाया गया।
भारत-पाकिस्तान विभाजन और लोकप्रियता
1947 के विभाजन के बाद भारत में हकीम अब्दुल हमीद ने और पाकिस्तान में हकीम मोहम्मद सईद ने हमदर्द की विरासत संभाली। दोनों देशों में रूह अफजा एक भावनात्मक जुड़ाव और सांस्कृतिक पहचान बन गया।
रूह अफजा के बहुमुखी उपयोग
- फालूदा में रंग और स्वाद बढ़ाने के लिए
- शाही टुकड़ा में चाशनी के रूप में
- कुल्फी में फ्लेवर देने के लिए
- मॉकटेल और लेमनेड में ताजगी के लिए
सांस्कृतिक महत्व
रूह अफजा रमजान के इफ्तार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह हर धर्म और समुदाय के लोगों के बीच समान रूप से लोकप्रिय है। इसे “मोहब्बत का शरबत” कहा जाता है।
बाबा रामदेव का विवाद
अप्रैल 2025 में बाबा रामदेव ने रूह अफजा पर विवादित टिप्पणी करते हुए इसे “शरबत जिहाद” कहा। सोशल मीडिया पर #BoycottPatanjali ट्रेंड हुआ। हालांकि रूह अफजा की लोकप्रियता और विरासत पर इसका कोई असर नहीं पड़ा।
हमदर्द की सामाजिक विरासत
हमदर्द कंपनी ने रूह अफजा की कमाई से स्कूल, अस्पताल और यूनिवर्सिटी स्थापित की। दिल्ली में हमदर्द यूनिवर्सिटी और कराची में हमदर्द अस्पताल इसकी मिसाल हैं।
निष्कर्ष
रूह अफजा सिर्फ एक शरबत नहीं, बल्कि संस्कृति, प्रेम और एकता का प्रतीक है। यह समय, विवाद और सीमाओं से परे जाकर सभी के दिलों में बसा हुआ है।
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