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जालना मर्चंट को-ऑपरेटिव बैंक पर ₹6 लाख का बड़ा जुर्माना!

जालना मर्चंट को-ऑपरेटिव बैंक पर ₹6 लाख का बड़ा जुर्माना!

जालना मर्चंट को-ऑपरेटिव बैंक पर ₹6 लाख का बड़ा जुर्माना!

कर्ज वितरण में गड़बड़ी उजागर, संचालक का इस्तीफा भी नहीं बचा सका बैंक को

जालना: शहर की जानी-मानी मर्चंट को-ऑपरेटिव बैंक एक बड़ी वित्तीय गड़बड़ी के चलते सुर्खियों में आ गई है। रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने बैंक द्वारा नियमों को ताक पर रखकर बांटे गए करोड़ों के कर्ज मामले में ₹6 लाख का कड़ा दंड लगाया है।

हैरानी की बात यह है कि बैंक का नेतृत्व खुद एक चार्टर्ड अकाउंटेंट कर रहे हैं, फिर भी नियमों की अनदेखी और जवाबदेही से बचने की कोशिशें नाकाम रहीं। संचालक का इस्तीफा भी RBI की कार्रवाई को नहीं रोक सका।

यह मामला न केवल सहकारी बैंकिंग प्रणाली की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि पारदर्शिता और जवाबदेही के अभाव में किसी भी संस्था की साख एक झटके में गिर सकती है।

रिज़र्व बैंक के अनुसार, बैंक द्वारा कुछ समूहों को बिना पर्याप्त मार्डगेज के कर्ज दिया गया, जो स्पष्ट रूप से बैंकिंग मानकों का उल्लंघन है। कारण बताओ नोटिस के बाद संतोषजनक उत्तर न मिलने पर ₹6 लाख का जुर्माना तय किया गया।

बैंक के अध्यक्ष गोपाल अग्रवाल स्वयं चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) हैं, इसके बावजूद बैंक में हुई अनियमितता अब खातेदारों और नागरिकों में चर्चा का विषय बन गई है।

तीन बैंकों पर कार्रवाई, जालना को सबसे अधिक दंड

  • मर्चंट को-ऑपरेटिव बैंक, जालना – ₹6 लाख
  • शहादा पीपल्स को-ऑपरेटिव बैंक – ₹2 लाख
  • सह्याद्री सहकारी बैंक लिमिटेड, मुंबई – ₹20,000

क्या है मामला?

बैंक के संचालक मनोहर शिनगारे ने अपने कुछ व्यावसायिक समूहों को ₹9 करोड़ का कर्ज मंजूर करवाया था, जिसमें से ₹4 करोड़ की वसूली हो चुकी है, जबकि ₹5 करोड़ की प्रक्रिया अभी जारी है।

ऑडिट रिपोर्ट में पाया गया कि यह कर्ज बिना अपेक्षित गारंटी या तारण के स्वीकृत किया गया था, जो बैंकिंग नियमों का उल्लंघन है। इसी आधार पर RBI ने कारण बताओ नोटिस जारी किया।

मई 2025 में सुनवाई से पूर्व ही बैंक ने संचालक मनोहर शिनगारे से इस्तीफा ले लिया, लेकिन रिजर्व बैंक ने इसे अस्वीकार कर स्पष्ट किया कि अनियमितता के समय वह पद पर थे, इसलिए पूरी संस्था की जिम्मेदारी बनती है।

बैंक की प्रतिक्रिया

बैंक के अध्यक्ष गोपाल अग्रवाल ने जुर्माने की पुष्टि की है। हालांकि वे शहर से बाहर थे और अधिक जानकारी नहीं दे सके।

यह मामला सहकारी बैंकों में पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही की आवश्यकता को दोहराता है। उच्च पदों पर विशेषज्ञों की मौजूदगी के बावजूद ऐसी चूकें चिंताजनक हैं और सुधार की आवश्यकता को दर्शाती हैं।

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