जालना : केरल के प्रसिद्ध गुरुवायूर श्रीकृष्ण मंदिर में ‘उदयास्तमना पूजा’ रद्द करने के प्रशासनिक निर्णय को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा कि “प्रशासनिक सुविधा या भीड़ प्रबंधन के नाम पर सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं में बदलाव नहीं किया जा सकता।” नोटरी एसोसिएशन महाराष्ट्र के कार्याध्यक्ष एडवोकेट महेश एस. धन्नावत ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि यह फैसला आस्था और परंपरा दोनों का सम्मान करता है और महाराष्ट्र सहित पूरे देश के लिए प्रेरणादायी है।
⚖️ सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
मामला गुरुवायूर श्रीकृष्ण मंदिर में ‘वृश्चिकम एकादशी’ के दिन होने वाली ‘उदयास्तमना पूजा’ की रद्दीकरण से जुड़ा था। मंदिर प्रशासन ने भीड़ नियंत्रण के कारण पूजा रद्द की थी, जिसके खिलाफ वंशानुगत पुजारी परिवारों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।
न्यायमूर्ति जे. के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने पुजारियों के पक्ष में निर्णय दिया और कहा कि, “धार्मिक परंपराएँ तथा विधियाँ केवल प्रबंधन की सुविधा के लिए संशोधित नहीं की जानी चाहिए; श्रद्धा प्रशासनिक बाधाओं से ऊपर है।” सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि यह पूजा पारंपरिक विधि-विधान के अनुसार 1 दिसंबर 2025 को संपन्न की जाए।
🛕 महाराष्ट्र के लिए महत्व
एडवोकेट महेश एस. धन्नावत ने कहा कि महाराष्ट्र पारंपरिक धार्मिक गतिविधियों और अनुष्ठानों की समृद्ध भूमि है — पंढरपुर वारी, तुलजापुर नवरात्र, शिर्डी की काकड आरती इत्यादि। उन्होंने जोड़ा कि अक्सर प्रशासनिक कारणों या भीड़ प्रबंधन के आधार पर परंपराओं में बदलाव की मांग उठती है; इस निर्णय से ऐसे हस्तक्षेपों पर कानूनी नियंत्रण स्थापित होगा।
“यह फैसला केवल एक पूजा से जुड़ा नहीं है — यह पूरे देश में धार्मिक स्वतंत्रता और परंपराओं की गरिमा की रक्षा का प्रतीक है। महाराष्ट्र के देवस्थान ट्रस्टों के लिए यह स्पष्ट संदेश है कि धार्मिक विधियों का पवित्र स्वरूप बनाए रखा जाना चाहिए।”
— एडवोकेट महेश एस. धन्नावत
⚖️ न्यायालय की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि पूजा और धार्मिक विधियों का लक्ष्य ईश्वर की दिव्यता को प्रकट करना है; इन्हें भक्तों की सुविधा या प्रशासनिक चिंताओं के अनुरूप बदलना उचित नहीं। अदालत ने यह भी कहा कि भीड़ या असुविधा स्वयं किसी धार्मिक कृत्य को रोकने का औचित्य नहीं दे सकते।
📜 संविधान और श्रद्धा का संतुलन
एडवोकेट महेश धन्नावत ने कहा कि यह निर्णय कानून और श्रद्धा के बीच संतुलन स्थापित करता है। भारतीय संविधान धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है और यह फैसला उस अधिकार को मजबूती प्रदान करता है।
🔍 निष्कर्ष
यह निर्णय सिर्फ गुरुवायूर के पुजारियों की जीत नहीं है; यह पूरे देश में धार्मिक परंपराओं के संरक्षण की दिशा में एक मील का पत्थर है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि “श्रद्धा प्रशासनिक सुविधा से बड़ी है” और यह सिद्धांत भविष्य में धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करेगा।

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