छात्र आंदोलन के समर्थन में डॉ. निलेश पगारे का बड़ा फैसला: ‘मुर्दों की नगरी’ का पुस्तक समारोह टाला, बोले—”छात्रों की आवाज़ से बड़ा कोई उत्सव नहीं”
दिल्ली में छात्रों पर कथित कार्रवाई के बाद लिया निर्णय • शिक्षा व्यवस्था पर उठाए गंभीर सवाल • आंदोलन को संवैधानिक दिशा देने की अपील
नई दिल्ली। देशभर में शिक्षा व्यवस्था को लेकर चल रहे छात्र आंदोलन के बीच युवा लेखक एवं स्वयं को अंतरराष्ट्रीय लेखक बताने वाले डॉ. निलेश पगारे ने एक बड़ा फैसला लेते हुए अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘मुर्दों की नगरी’ का प्रस्तावित उप-प्रकाशन समारोह स्थगित कर दिया है। उन्होंने कहा कि जब देश का विद्यार्थी अपने भविष्य और अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा हो, तब किसी भी प्रकार का व्यक्तिगत उत्सव मनाना उचित नहीं है।
डॉ. पगारे ने छात्र आंदोलन के दौरान सामने आए घटनाक्रम पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि शिक्षा से जुड़े मुद्दों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए और विद्यार्थियों की आवाज़ को लोकतांत्रिक तरीके से सुना जाना चाहिए।
छात्रों के समर्थन में टाला पुस्तक समारोह
डॉ. निलेश पगारे की चर्चित पुस्तक ‘मुर्दों की नगरी’ का उप-प्रकाशन समारोह 20 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में आयोजित होना था। यह कार्यक्रम ‘इंटरनेशनल ऐप स्टोर’ के मंच पर प्रस्तावित था।
हालांकि, उसी दिन राजधानी में छात्र आंदोलन से जुड़े घटनाक्रम सामने आने के बाद उन्होंने समारोह को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करने का निर्णय लिया।
डॉ. पगारे ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में छात्रों के संघर्ष के साथ खड़ा होना उनकी नैतिक जिम्मेदारी है।
7 जुलाई को दिए बयान का किया उल्लेख
डॉ. पगारे ने कहा कि उन्होंने 7 जुलाई 2026 को छात्र आंदोलन के संबंध में जो विचार व्यक्त किए थे, उनमें शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों, आंदोलन की रणनीति और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के महत्व पर जोर दिया गया था।
उनका कहना है कि हाल की घटनाओं ने शिक्षा व्यवस्था में सुधार और विद्यार्थियों से जुड़े मुद्दों पर गंभीर विचार-विमर्श की आवश्यकता को और अधिक स्पष्ट किया है।
शिक्षा व्यवस्था पर जताई चिंता
अपने वक्तव्य में डॉ. पगारे ने कहा कि लगातार सामने आने वाले पेपर लीक, परीक्षा प्रणाली पर उठते सवाल और विद्यार्थियों में बढ़ती चिंता देश के लिए गंभीर विषय हैं।
उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल परीक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के भविष्य और युवाओं के विश्वास से जुड़ा विषय है। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और विश्वसनीय बनाने की आवश्यकता है।
आंदोलन की दिशा पर रखी राय
डॉ. पगारे ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन की सफलता उसकी रणनीति और संवैधानिक दायरे में रहकर किए गए प्रयासों पर निर्भर करती है।
उन्होंने सुझाव दिया कि आंदोलन को उन संस्थानों और विभागों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाया जाए जो संबंधित निर्णय लेने की स्थिति में हों। साथ ही उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से जनहित के मुद्दे उठाने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर दिया जोर
डॉ. पगारे ने अपने वक्तव्य में कहा कि लोकतंत्र में जनता की आवाज़ संसद, विधानसभाओं और संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से प्रभावी ढंग से उठाई जा सकती है।
उन्होंने कहा कि शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय पर सरकार, विपक्ष, शिक्षाविदों और समाज के सभी वर्गों को मिलकर समाधान खोजने की आवश्यकता है।
छात्रों से संयम और शांतिपूर्ण आंदोलन की अपील
उन्होंने विद्यार्थियों से अपील की कि वे अपनी मांगों को शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से रखें तथा किसी भी प्रकार की हिंसा या कानून-व्यवस्था को प्रभावित करने वाली गतिविधियों से दूर रहें।
डॉ. पगारे ने कहा कि संवाद, लोकतांत्रिक प्रक्रिया और संवैधानिक व्यवस्था ही किसी भी स्थायी समाधान का सबसे प्रभावी मार्ग है।
शिक्षा सुधार पर राष्ट्रीय विमर्श की जरूरत
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता, पेपर लीक पर प्रभावी रोक, विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य और परीक्षा प्रणाली में सुधार जैसे विषयों पर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा की आवश्यकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, संस्थागत सुधार और जवाबदेही बढ़ाने से ही विद्यार्थियों का विश्वास मजबूत किया जा सकता है।
डॉ. पगारे का संदेश
अपने संदेश में डॉ. निलेश पगारे ने कहा कि—
“जब देश का विद्यार्थी अपने भविष्य के लिए संघर्ष कर रहा हो, तब समाज का प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक उसके साथ खड़ा होने का नैतिक दायित्व रखता है। शिक्षा व्यवस्था में सुधार केवल विद्यार्थियों का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का प्रश्न है।”
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