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“मालेगांव ब्लास्ट केस: कोर्ट ने मोहन भागवत को फंसाने की दलील को किया खारिज, सभी आरोपी बरी”

मालेगांव ब्लास्ट केस: कोर्ट ने आरएसएस प्रमुख को फंसाने की दलील को किया खारिज

मालेगांव ब्लास्ट केस: कोर्ट ने आरएसएस प्रमुख को फंसाने की दलील को किया खारिज, सभी आरोपी बरी

मुंबई | 3 अगस्त 2025

मालेगांव 2008 विस्फोट मामले में मुंबई स्थित विशेष एनआईए अदालत ने एक अहम फैसला सुनाते हुए सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आतंकवाद निरोधक दस्ते (ATS) द्वारा प्रस्तुत किए गए साक्ष्य अपर्याप्त, विरोधाभासी और संदेहास्पद हैं, जिनके आधार पर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता।

🔹 मोहन भागवत को फंसाने की साजिश वाली दलील खारिज

एक आरोपी स्वामी अमृतानंद देवतीर्थ उर्फ सुधाकर धर द्विवेदी ने दावा किया था कि ATS पूर्व आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को मामले में फंसाना चाहती थी। उसने पूर्व एटीएस अधिकारी मेहबूब मुझावर के बयान का हवाला दिया, जिन्होंने यह आरोप लगाया था कि उन्हें मोहन भागवत को गिरफ्तार करने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया।

कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि मुझावर का बयान किसी अन्य कोर्ट (सोलापुर) में धारा 313 के तहत दर्ज किया गया था और इसका इस मामले में कोई विधिक मूल्य नहीं है।

🔹 ATS जांच में गंभीर खामियां

कोर्ट ने यह भी कहा कि ATS की जांच में कई महत्वपूर्ण कमियां थीं — जैसे कि चश्मदीदों पर दबाव डालना, गवाही में विरोधाभास, और आरोपियों की घटनास्थल पर उपस्थिति साबित न कर पाना। अदालत ने कहा कि केवल संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

🔹 SIMI कनेक्शन का भी प्रमाण नहीं

ATS ने दावा किया था कि एक ट्रांसपोर्ट ऑफिस, जहां विस्फोट से संबंधित गतिविधियां हुईं, उसी इमारत में था जिसमें पहले स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI) का कार्यालय था। लेकिन कोर्ट ने पाया कि ATS यह प्रमाणित करने में असफल रही कि SIMI का वहां कोई सक्रिय कनेक्शन था।

🔹 UAPA के तहत मंजूरी भी अवैध

कोर्ट ने यह भी कहा कि यूएपीए (Unlawful Activities Prevention Act) के तहत दी गई अभियोजन स्वीकृति विधिसम्मत नहीं थी, जिससे इस कानून के तहत विशेष धाराएं स्वतः लागू नहीं हो सकतीं।

🔸 निष्कर्ष

विशेष एनआईए अदालत ने अपने विस्तृत 1036 पन्नों के फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष दोष सिद्ध करने में पूरी तरह विफल रहा। कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपियों के खिलाफ न तो कोई पुख्ता सबूत है और न ही गवाहियों में स्थायित्व। परिणामस्वरूप, सभी सात आरोपी—जिनमें साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल प्रसाद पुरोहित शामिल हैं—को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।


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