574 करोड़ खर्च के बाद भी महाराष्ट्र के शहरों की हवा जहरीली — मुंबई, मालेगांव, जालना और जलगांव में प्रदूषण का स्तर खतरनाक
मुंबई: महाराष्ट्र में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए 574 करोड़ रुपये खर्च किए जाने के बावजूद, राज्य के अधिकांश शहरों की हवा अब भी खतरनाक स्तर पर बनी हुई है। मुंबई, मालेगांव, जालना, जलगांव जैसे प्रमुख शहरों में हवा की गुणवत्ता चिंताजनक रूप से खराब पाई गई है। यह जानकारी “वातावरण फाउंडेशन” और “एन्वारोकैटलिस्ट” की ताजा संयुक्त रिपोर्ट से सामने आई है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आठ वर्षों के आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने 15वें वित्त आयोग के तहत प्रदूषण नियंत्रण के लिए बड़े पैमाने पर निधि जारी की थी। लेकिन स्थानीय निकायों ने इस राशि का प्रभावी उपयोग नहीं किया।
मुंबई ने खर्च किए 574 करोड़, लेकिन प्रदूषण जस का तस
मुंबई को वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए 938.59 करोड़ रुपये का बजट मिला था, जिनमें से 574.64 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इसके बावजूद, वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) “खराब” श्रेणी में ही बना हुआ है। मुंबई का औसत पीएम 2.5 स्तर 55–60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के बीच दर्ज किया गया है, जो सुरक्षित सीमा से दोगुना अधिक है।
नागपुर में सबसे कम राशि खर्च
अमरावती और सोलापुर जैसे शहरों ने अपने हिस्से के 95% से अधिक फंड का उपयोग किया, जबकि नागपुर ने 142 करोड़ में से आधे से भी कम राशि खर्च की। यह राशि सड़क धूल नियंत्रण, वाहन उत्सर्जन निगरानी, औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण और हरित क्षेत्र बढ़ाने के लिए दी गई थी।
मालेगांव, जालना और जलगांव में सबसे ज्यादा प्रदूषण
रिपोर्ट में बताया गया है कि मालेगांव में पीएम 2.5 की मात्रा सबसे अधिक दर्ज की गई। इसके बाद जालना और जलगांव का स्थान रहा। वहीं, सांगली में सबसे कम प्रदूषण दर्ज हुआ। परभणी, अहमदनगर और नवी मुंबई जैसे शहरों में भी वायु प्रदूषण के स्तर में वृद्धि हुई है।
“अगर सर्दियों से पहले और सर्दियों के दौरान ठोस रणनीति नहीं बनाई गई, तो महाराष्ट्र के लिए यह एक बड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन सकता है।”
— भगवान केसभट, वातावरण फाउंडेशन
“हम जिस आपात स्थिति का सामना कर रहे हैं, उसके मुकाबले उत्सर्जन नियंत्रण के उपाय बेहद अपर्याप्त हैं।”
— सुनील दहिया, एन्वारोकैटलिस्ट
PM 2.5 क्या है?
PM 2.5 हवा में मौजूद अत्यंत सूक्ष्म प्रदूषक कण होते हैं जिनका आकार 2.5 माइक्रोमीटर से कम होता है। ये फेफड़ों में गहराई तक जाकर रक्त प्रवाह में प्रवेश कर सकते हैं, जिससे हृदय, मस्तिष्क और अन्य अंगों पर गंभीर असर पड़ता है। लंबे समय तक इनका प्रभाव श्वसन और हृदय रोगों का खतरा बढ़ाता है।
आगे की राह
- प्रदूषण नियंत्रण फंड के उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
- वाहन, उद्योग और निर्माण क्षेत्रों में उत्सर्जन पर सख्त निगरानी हो।
- हर मौसम के लिए ठोस वायु प्रबंधन योजना बनाई जाए।
- जनजागरूकता अभियान चलाकर नागरिकों को प्रदूषण कम करने के उपाय सिखाए जाएं।
— रिपोर्ट: NewsNationOnline Team

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