गठबंधन की राजनीति में सबसे बड़ी कीमत: एक आम कार्यकर्ता
जालना | विशेष टिप्पणी
नगरपालिका और महानगरपालिका चुनावों की घोषणा के साथ ही राजनीति का असली चेहरा सामने आ जाता है—सीटों का गणित, सत्ता की जोड़-तोड़ और वर्चस्व की जंग। मंचों पर भाषण गूंजते हैं, रणनीतिक बैठकें होती हैं और गठबंधन बनने–टूटने के समीकरण तय होते हैं। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में सबसे अधिक पीड़ा उस आम कार्यकर्ता को सहनी पड़ती है, जो वर्षों तक धूप–बारिश में मेहनत कर संगठन की नींव मजबूत करता है।
नेताओं के लिए गठबंधन बनाना या ऐन वक्त पर तोड़ देना एक रणनीतिक निर्णय भर हो सकता है, लेकिन जमीनी कार्यकर्ता के लिए यह उसकी साख, सामाजिक रिश्तों और जीवनभर की निष्ठा का इम्तिहान बन जाता है। समाजसेवी श्याम सारस्वत का कहना है कि राजनीतिक फैसलों की असली कीमत अक्सर वही चुकाता है, जिसकी आवाज सबसे कम सुनी जाती है।
ऐन वक्त पर टूटते गठबंधन और बिखरता कार्यकर्ता
चुनाव से ठीक पहले गठबंधन टूटने का फैसला कार्यकर्ताओं के लिए सबसे बड़ा झटका साबित होता है। जिस क्षेत्र में उन्होंने सालों तक पसीना बहाया होता है, जहां घर–घर जाकर संगठन के लिए समर्थन जुटाया होता है, वहां अचानक “अपने दम पर लड़ो” का आदेश आ जाता है। कई बार तो नामांकन की अंतिम तिथि तक यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि गठबंधन रहेगा या नहीं। ऐसी स्थिति में कार्यकर्ता असमंजस में पड़ जाता है—किसका प्रचार करे और किसके खिलाफ खड़ा हो।
त्रासदी के कई चेहरे
गठबंधन की राजनीति में कार्यकर्ता की पीड़ा कई रूपों में सामने आती है—
- शर्मिंदगी और असहजता: कल तक जिनके साथ गठबंधन की उम्मीद में मेलजोल था, आज उन्हीं की नीतियों और कमियों पर सवाल उठाने पड़ते हैं।
- तैयारी की कमी: अकेले दम पर चुनाव लड़ने के लिए संसाधन, धन और संगठनात्मक ताकत अचानक जुटाना आसान नहीं होता।
- जनता का आक्रोश: बार-बार बदलते राजनीतिक रुख को मतदाताओं को समझाते-समझाते कार्यकर्ता खुद संदेह और सवालों के घेरे में आ जाता है।
‘लड़ो, मरो और फिर कतार में लग जाओ’
आज की राजनीति में यह मानो एक अनकहा नियम बन गया है। गठबंधन बने या टूटे, बड़े नेताओं के पद, प्रभाव और भविष्य सुरक्षित रहते हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ता अपने ही समाज में विरोध, कटुता और अलगाव झेलता है। एक कार्यकर्ता की पीड़ा इन शब्दों में साफ झलकती है—
“बड़े नेता चाय की मेज पर फैसले लेते हैं, लेकिन गली–मोहल्लों की लड़ाई हमें लड़नी पड़ती है।”
जब नेता कहते हैं “लड़ो”, तो उसका अर्थ अक्सर यही होता है कि कार्यकर्ता सब कुछ दांव पर लगा दे। नतीजे आने पर हारने वालों को भुला दिया जाता है, जबकि जीतने वालों को सत्ता के पीछे खड़ा कर दिया जाता है।
क्या कार्यकर्ता सिर्फ साधन बनकर रह गया है?
स्थानीय चुनावों में रिश्ते बेहद निजी होते हैं। यहां पड़ोसी–पड़ोसी के सामने खड़ा होता है और राजनीतिक टकराव सामाजिक रिश्तों तक पहुंच जाता है। ऐसे में नेताओं के ‘सुविधाजनक’ फैसले कार्यकर्ताओं के दिल पर गहरी चोट करते हैं। गठबंधन बने तो टिकट कटने का डर, और टूटे तो अकेले लड़ने की मजबूरी—दोनों ही परिस्थितियों में बलि कार्यकर्ता की ही चढ़ती है।
नेताओं को सत्ता का गणित साधना होता है, जबकि कार्यकर्ता को अपनी साख, रिश्ते और भरोसा बचाना होता है। यदि राजनीतिक दल कार्यकर्ताओं को केवल ‘वोट जुटाने की मशीन’ समझते रहेंगे, तो भविष्य में निष्ठावान और समर्पित कार्यकर्ताओं की फौज मिलना मुश्किल हो जाएगा। शायद अब समय आ गया है कि कार्यकर्ता खुद से सवाल करे—वह किसके लिए, क्यों और किस कीमत पर यह लड़ाई लड़ रहा है।

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