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लखनऊ कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: झूठे गैंगरेप और SC/ST केस में महिला को साढ़े सात साल की जेल

लखनऊ कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: झूठे बलात्कार और SC/ST केस में महिला को जेल

लखनऊ कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: झूठे बलात्कार और SC/ST केस में महिला को साढ़े सात साल की जेल

रिपोर्ट: न्यूज़ नेशन हिंदी डेस्क | तारीख: जून 2025

मुख्य बात: झूठे गैंगरेप और अॅट्रॉसिटी के आरोप में महिला को कोर्ट ने दोषी करार देते हुए साढ़े सात साल की कठोर सजा सुनाई। यह फैसला कानून के दुरुपयोग के खिलाफ बड़ी चेतावनी है।

मामले की पृष्ठभूमि

2018 में लखनऊ की एक महिला ने दो पुरुषों पर बलात्कार और जातिगत अत्याचार का झूठा आरोप लगाया। FIR दर्ज होते ही दोनों पुरुषों को समाजिक तिरस्कार, नौकरी से बर्खास्तगी और मानसिक यातना झेलनी पड़ी। जांच के बाद ये आरोप पूरी तरह गलत और द्वेषपूर्ण साबित हुए।

जांच में क्या निकला?

जांच में पुलिस को कोई मेडिकल या डिजिटल साक्ष्य नहीं मिला जिससे महिला के आरोपों की पुष्टि हो सके। कॉल रिकॉर्ड, GPS लोकेशन और CCTV फुटेज ने साबित किया कि आरोपी घटनास्थल पर थे ही नहीं।

कोर्ट का फैसला और टिप्पणियां

विशेष SC/ST न्यायालय के न्यायाधीश श्रीराम राय ने IPC की धारा 182, 211, 193 और SC/ST अधिनियम की धारा 3(1)(v) के तहत महिला को दोषी माना। जज ने कहा:

“जो लोग न्याय प्रणाली को व्यक्तिगत दुश्मनी के लिए हथियार बनाते हैं, उन्हें दंडित करना न्याय का हिस्सा है। कानून का दुरुपयोग भी अपराध है।”

कानूनी विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया

वरिष्ठ अधिवक्ताओं और पूर्व जजों ने इस फैसले की सराहना की। उन्होंने इसे ‘न्यायपालिका की मजबूती और संतुलन का प्रमाण’ बताया। उनका मानना है कि इससे असली पीड़ितों को न्याय दिलाने में मदद मिलेगी और झूठे आरोपियों की हिम्मत टूटेगी।

आरोप झेल चुके युवकों की प्रतिक्रिया

“हमने पांच साल मानसिक नर्क झेला,” — दोनों निर्दोष युवकों ने फैसले के बाद कहा। उन्होंने बताया कि कैसे समाज ने उन्हें बहिष्कृत किया, रिश्तेदारों ने किनारा किया और उनका जीवन ठहर सा गया।

समाज और न्याय पर प्रभाव

यह फैसला पूरे देश के लिए उदाहरण है। कानूनों की गंभीरता और संवेदनशीलता तभी कायम रहेगी जब दुरुपयोग करने वालों को भी सजा मिले।

महत्वपूर्ण सवाल

  • क्या ऐसे मामलों में स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई होनी चाहिए?
  • क्या महिला संगठनों को भी जिम्मेदारी लेनी चाहिए?
  • क्या झूठे मामलों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट अनिवार्य होना चाहिए?
निष्कर्ष: यह फैसला केवल एक केस नहीं बल्कि भारत की न्याय प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही का प्रतीक बन गया है।
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