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मद्रास हाईकोर्ट ने समन में 12 साल की देरी पर दिखाई सख्ती; ‘ई-समन प्रणाली’ को किया अनिवार्य

समन बजावने में 12 साल की देरी पर मद्रास हाईकोर्ट सख्त, कहा – अब ‘ई-समन प्रणाली’ अनिवार्य; महाराष्ट्र को भी सबक लेना चाहिए: एडवोकेट महेश एस. धन्नावत

जालना : फौजदारी मामले में आरोपी को समन भेजने में 12 वर्षों की देरी पर मद्रास उच्च न्यायालय ने कड़ी नाराज़गी व्यक्त की है। अदालत ने पुलिस और निचली न्यायपालिका दोनों को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि इस तरह की लापरवाही न्याय प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाती है। न्यायालय ने भविष्य में ऐसे मामलों से बचने के लिए ‘ई-समन प्रणाली’ (E-Summons System) को सख्ती से लागू करने के निर्देश दिए।

इस निर्णय पर प्रतिक्रिया देते हुए नोटरी एसोसिएशन, जालना के कार्याध्यक्ष एडवोकेट महेश एस. धन्नावत ने कहा कि “यह फैसला न केवल तमिलनाडु, बल्कि पूरे देश, विशेष रूप से महाराष्ट्र के लिए एक चेतावनी है। यहां भी हजारों मामले सिर्फ समन या वारंट की तामील में देरी के कारण वर्षों से लंबित हैं। अब समय आ गया है कि महाराष्ट्र न्यायपालिका भी ई-समन प्रणाली को प्रभावी रूप से लागू करे।”

📂 मामला क्या है?

यह प्रकरण वर्ष 2013 का है जब एक महिला ने अपने ससुराल पक्ष के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 294(ब) (सार्वजनिक स्थान पर अश्लील कृत्य), 506(1) (धमकी देना) तथा तमिलनाडु महिला उत्पीड़न निवारण अधिनियम, 1998 की धारा 4 के तहत शिकायत दर्ज कराई थी। उसी वर्ष आरोपपत्र दायर हो गया था, लेकिन आरोपी को समन 12 वर्षों तक नहीं भेजा गया। अंततः जून 2025 में समन प्राप्त हुआ, जिसके बाद आरोपी ने मुकदमा रद्द करने के लिए मद्रास हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

न्यायमूर्ति बी. पुगालेंधी की खंडपीठ ने मुकदमा रद्द करने से इनकार करते हुए कहा — “आरोप सिद्ध हो या नहीं, परंतु केवल समन न बजाने के कारण 12 वर्षों तक मुकदमा लंबित रहना, न्यायिक तंत्र की असफलता है।”

⚖️ अदालत की सख्त टिप्पणियाँ

अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि पुलिस ने न तो समन की तामील सुनिश्चित की और न ही असफलता की रिपोर्ट अदालत में दी। साथ ही, निचली अदालत ने भी यह जांचने का प्रयास नहीं किया कि समन भेजा गया या नहीं। न्यायालय ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 67 (पूर्व क्रि.प्र.सं. की धारा 65 के अनुरूप) का उल्लेख करते हुए कहा कि अब इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से समन जारी करना कानूनी रूप से मान्य है — इसके बावजूद इसका पालन नहीं किया गया।

💻 ई-समन प्रणाली की आवश्यकता

मद्रास हाईकोर्ट ने अपने आदेश में पुलिस विभाग और उच्च न्यायालय प्रशासन को ई-समन मोबाइल एप्लिकेशन के उपयोग को अनिवार्य रूप से लागू करने के निर्देश दिए। अदालत ने कहा — “तकनीक के युग में पारंपरिक विलंब स्वीकार्य नहीं है। इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली के माध्यम से ही न्याय की गति बढ़ाई जा सकती है।”

📜 महाराष्ट्र के लिए सीख

एडवोकेट महेश एस. धन्नावत ने कहा — “महाराष्ट्र में भी कई मामले वर्षों से केवल समन या वारंट की तामील में देरी के कारण लंबित हैं। अब जबकि नया कानून इलेक्ट्रॉनिक समन को वैध ठहरा चुका है, राज्य के न्यायालयों और पुलिस को इस प्रणाली का पूर्ण उपयोग करना चाहिए।”

उन्होंने कहा कि “ई-समन प्रणाली से न केवल समय और संसाधनों की बचत होगी, बल्कि मानवीय त्रुटियों और विलंब को भी समाप्त किया जा सकेगा। इससे पीड़ितों को समय पर न्याय मिलने का मार्ग प्रशस्त होगा।”

अदालत ने इस विशेष मामले की सुनवाई तीन महीनों में पूर्ण करने के आदेश दिए हैं, ताकि पीड़ित पक्ष को अब और विलंब का सामना न करना पड़े।

🖋️ लेखक: NewsNationOnline Team


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