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विधानसभा सदस्यों की शपथ: क्या होता है अगर विधायक शपथ नहीं लेते? संवैधानिक प्रावधानों की विस्तृत पड़ताल

Oath of Assembly members: What happens if MLAs do not take oath? A detailed analysis of constitutional provisions

विधानसभा चुनावों में निर्वाचित प्रत्येक उम्मीदवार, चुनाव आयोग द्वारा अधिसूचना जारी किए जाने के बाद ही विधायिका का सदस्य बन जाता है। लेकिन भारतीय संविधान के तहत, किसी भी निर्वाचित सदस्य के लिए शपथ लेना अनिवार्य है। शपथ के बिना, सदस्य सदन में अधिकारिक रूप से कामकाज में भाग नहीं ले सकता।

हाल ही में महाराष्ट्र विधानसभा के विशेष सत्र में विपक्षी दलों द्वारा शपथ लेने से इनकार करने के बाद यह मुद्दा चर्चा में आ गया है। आइए जानते हैं कि शपथ न लेने के संवैधानिक, कानूनी और राजनीतिक परिणाम क्या हो सकते हैं।



संविधान का अनुच्छेद 188 और शपथ की प्रक्रिया

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 188 कहता है कि विधानसभा या विधान परिषद का प्रत्येक सदस्य राज्यपाल द्वारा निर्धारित प्रारूप के अनुसार सदन में शपथ लेगा। शपथ के बिना, सदस्य सदन की प्रक्रिया में भाग लेने के अयोग्य माना जाता है।

संविधान की तीसरी अनुसूची में शपथ का प्रारूप दिया गया है, जिसमें यह स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि सदन का सदस्य बनने के लिए शपथ लेना आवश्यक है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसलों में इस विषय पर गहराई से चर्चा की है। रामेश्वर प्रसाद बनाम केंद्र सरकार और राजस्थान सरकार बनाम केंद्र सरकार जैसे मामलों में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि लोकसभा या विधानसभा अधिसूचना जारी होने के बाद अस्तित्व में आ जाती है। लेकिन शपथ के बिना सदस्य सदन में कार्यवाही का हिस्सा नहीं बन सकता।

महाराष्ट्र विधानसभा का विवाद: क्या हुआ?

महाराष्ट्र में हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों के बाद, शनिवार को नए सदन का पहला विशेष सत्र बुलाया गया। कार्यवाहक अध्यक्ष कालिदास कोलंबकर ने सभी निर्वाचित सदस्यों को शपथ लेने के लिए बुलाया।

हालांकि, विपक्षी दल महाविकास आघाड़ी के विधायकों ने शपथ लेने से इनकार कर दिया और सदन का बहिष्कार किया। विपक्ष ने आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ महायुती सरकार ने ईवीएम में गड़बड़ी करके चुनाव जीता है।

शपथ न लेने के इस कदम ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है। सत्तारूढ़ दल ने इसे संवैधानिक प्रक्रिया की अवहेलना बताते हुए विपक्ष पर लोकतांत्रिक मूल्यों का अपमान करने का आरोप लगाया।


शपथ न लेने के परिणाम

संवैधानिक परिणाम:

संविधान के अनुसार, जब तक कोई सदस्य शपथ नहीं लेता, वह सदन की प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकारी नहीं होता।

शपथ न लेने की स्थिति में सदस्य सदन की किसी भी बैठक में भाग नहीं ले सकता, न ही मतदान कर सकता है।

कानूनी परिणाम:

लंबे समय तक शपथ न लेने पर सदस्य की सदस्यता रद्द करने का प्रावधान हो सकता है।

विपक्ष का यह कदम अगर असंवैधानिक पाया जाता है, तो यह न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।

राजनीतिक परिणाम:

शपथ न लेने से सदन की कार्यवाही बाधित हो सकती है।
सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवादहीनता बढ़ सकती है, जिससे राज्य की राजनीतिक स्थिरता पर असर पड़ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने पार्टी विरोधी कानून और शपथ से संबंधित मामलों में पहले भी कई दिशा-निर्देश दिए हैं। उदाहरण के लिए:

1. शपथ महज औपचारिकता नहीं है: यह सदस्यता को वैधानिक रूप से मान्यता प्रदान करता है।


2. शपथ का महत्व: शपथ न लेने पर सदस्य की स्थिति केवल “निर्वाचित उम्मीदवार” की होती है, “सदन के सदस्य” की नहीं।

ऐतिहासिक संदर्भ

इससे पहले भी कुछ राज्यों में विपक्षी दलों ने शपथ ग्रहण का बहिष्कार किया है। हालांकि, बाद में संवैधानिक बाध्यता के चलते उन्हें शपथ लेनी पड़ी।

उदाहरण: झारखंड और कर्नाटक के कुछ मामलों में विधायकों ने पहले दिन शपथ लेने से इनकार किया था। लेकिन न्यायालय ने हस्तक्षेप करते हुए उन्हें शपथ लेने के लिए बाध्य किया।

आगे की संभावनाएँ

1. न्यायिक हस्तक्षेप:

अगर विपक्ष शपथ नहीं लेता है, तो यह मामला अदालत तक जा सकता है।

राज्यपाल या विधानसभा अध्यक्ष इस मामले में कार्रवाई कर सकते हैं।



2. राजनीतिक समाधान:

सत्तारूढ़ और विपक्षी दल के बीच वार्ता के जरिए समस्या का हल निकाला जा सकता है।



3. विधानसभा की कार्यवाही:

अगर विपक्ष लंबी अवधि तक शपथ नहीं लेता, तो सदन में विधायी कामकाज बाधित हो सकता है।

निष्कर्ष

विधायकों द्वारा शपथ न लेना संवैधानिक, कानूनी और राजनीतिक दृष्टि से गंभीर मुद्दा है। विपक्ष का यह कदम संवैधानिक प्रक्रिया को बाधित करने का कारण बन सकता है। ऐसे में, शपथ न लेने के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों और संवैधानिक प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए समाधान खोजना जरूरी होगा।

राजनीतिक दलों को संवैधानिक प्रक्रिया का सम्मान करते हुए लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखना चाहिए, ताकि सदन का कामकाज सुचारू रूप से चल सके।


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Imran Siddiqui

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