हाईकोर्ट की लताड़ के बाद भी क्या नहीं जागेगा प्रशासन? जालना में अतिक्रमण हटाने की उठी तेज़ मांग
जालना | प्रतिनिधि
मुंबई शहर में अतिक्रमण को लेकर मुंबई उच्च न्यायालय द्वारा बृहन्मुंबई महानगरपालिका की कार्यप्रणाली पर की गई कड़ी टिप्पणी ने पूरे महाराष्ट्र में प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालत ने तीखे शब्दों में पूछा है कि क्या नगर प्रशासन अतिक्रमणकारियों के सामने पूरी तरह असहाय हो चुका है और क्या सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा के बजाय केवल “भावनाओं और धार्मिक अधिकारों” की आड़ लेकर कार्रवाई से बचा जा रहा है। जालना अतिक्रमण
इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति रवींद्र घुगे और न्यायमूर्ति अभय मंत्री की खंडपीठ के समक्ष हुई।
अवैध अतिक्रमण से बच्चों की सुरक्षा पर खतरा
यह मामला पवई स्थित ब्यूमोंट एचएफएसआई प्री-प्रायमरी स्कूल द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि जोगेश्वरी–विक्रोली लिंक रोड से जुड़े मार्ग पर बड़े पैमाने पर अवैध अतिक्रमण कर लिए गए हैं। इन अतिक्रमणों के कारण सड़कें संकरी हो गई हैं और फुटपाथ पूरी तरह बंद हो चुके हैं, जिससे छोटे बच्चों और आम नागरिकों को जान जोखिम में डालकर मुख्य सड़क पर चलना पड़ रहा है।
“क्या प्रशासन ने शहर अतिक्रमणकारियों के हवाले कर दिया है?”
सुनवाई के दौरान अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में नागरिकों को वाहनों की जगह साइकिल या घोड़ों का सहारा लेना पड़ेगा। खंडपीठ ने अतिक्रमणकारियों को मोबाइल शौचालय और पानी के टैंकर उपलब्ध कराने पर बृहन्मुंबई महानगरपालिका को कड़ी फटकार लगाई।
जब महानगरपालिका की ओर से यह तर्क दिया गया कि अतिक्रमण हटाने गए अधिकारियों पर हमले होते हैं, तो अदालत और अधिक नाराज़ हो गई। न्यायमूर्ति घुगे ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि क्या प्रशासन में इच्छाशक्ति और साहस की कमी हो गई है और क्या शहर को अतिक्रमणकारियों के भरोसे छोड़ दिया गया है। अदालत ने यह भी चेतावनी दी कि “मोबाइल शौचालय हटाना संभव नहीं है” जैसी दलीलें देने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई तक की जा सकती है।
जालना में भी वही हालात: एड. महेश एस. धन्नावत
इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए नोटरी एसोसिएशन के कार्याध्यक्ष एड. महेश एस. धन्नावत ने कहा कि मुंबई जैसी ही स्थिति जालना में भी देखने को मिल रही है। उन्होंने कहा कि जालना शहर के प्रमुख मार्गों, राष्ट्रीय राजमार्गों, स्कूलों और महाविद्यालयों के आसपास बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हो चुके हैं, जिससे यातायात बाधित होता है और नागरिकों की सुरक्षा पर सीधा खतरा पैदा हो रहा है। जालना अतिक्रमण
एड. धनावत के अनुसार, जालना में अतिक्रमण हटाने के बाद कुछ ही दिनों में वे दोबारा उसी स्थान या किसी अन्य जगह खड़े हो जाते हैं। यह पूरा मामला “टॉम एंड जेरी” के खेल जैसा बन चुका है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि जालना के महानगरपालिका आयुक्त ही जिले के जिलाधिकारी भी हैं, ऐसे में उनके पास दोहरी जिम्मेदारी और अधिकार हैं और उनसे सख्त तथा त्वरित कार्रवाई की अपेक्षा की जाती है।
प्रशिक्षित नगरसेवकों से सख्त अपील
एड. धनावत ने नवनिर्वाचित और प्रशिक्षित नगरसेवकों से आह्वान किया कि वे किसी दबाव या बहाने का इंतजार किए बिना शहर को अतिक्रमण मुक्त करने की दिशा में ठोस कदम उठाएं। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक स्थानों की रक्षा करना नगरसेवकों और प्रशासन का प्राथमिक कर्तव्य है।
निष्कर्ष
मुंबई उच्च न्यायालय की सख्त टिप्पणियां यह स्पष्ट संदेश देती हैं कि शहरों का नियोजन और सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा प्रशासन की जिम्मेदारी है। तुष्टिकरण की राजनीति या इच्छाशक्ति की कमी के कारण शहरों को अव्यवस्थित होने देना आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय है। कानून का शासन बनाए रखने और नागरिकों को सुरक्षित जीवन देने के लिए प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को निर्भीक होकर अपने कर्तव्यों का पालन करना होगा।
- बॉम्बे हाईकोर्ट – आधिकारिक वेबसाइट
https://bombayhighcourt.nic.in - बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC)
https://portal.mcgm.gov.in - शहरी अतिक्रमण और सार्वजनिक भूमि कानून – भारत सरकार
https://legislative.gov.in
जालना अतिक्रमण

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