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पर्याप्त विमर्श के बिना लागू की गई नई शिक्षा नीति 2020 : डॉ. सुखदेव थोरात

पर्याप्त विमर्श के बिना लागू की गई नई शिक्षा नीति 2020 : डॉ. सुखदेव थोरात

छत्रपति संभाजीनगर | 13 जनवरी (संवाददाता)
नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 देश की संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन का दावा करती है, लेकिन इतनी व्यापक और दूरगामी प्रभाव डालने वाली नीति को लागू करने से पहले जिस स्तर की गहन चर्चा, जनभागीदारी और विभिन्न हितधारकों से सुझाव लेने की प्रक्रिया अपेक्षित थी, वह पर्याप्त रूप से नहीं अपनाई गई। यह स्पष्ट और तीखी आलोचना वरिष्ठ अर्थशास्त्री एवं पूर्व विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) अध्यक्ष डॉ. सुखदेव थोरात ने की।

डॉ. थोरात डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय, छत्रपति संभाजीनगर तथा महाविद्यालयीन प्राध्यापक संगठन (बामुक्टो) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला में मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे। कार्यशाला का विषय “नई शिक्षा नीति (2020) और बहुजन समाज का भविष्य” रखा गया था। कार्यक्रम की अध्यक्षता बामुक्टो के अध्यक्ष डॉ. बप्पासाहेब मस्के ने की।

कार्यक्रम की शुरुआत छत्रपति शिवाजी महाराज और भारतरत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के चित्रों के पूजन से की गई। प्रस्तावना डॉ. मारोती तेगमपुरे ने प्रस्तुत की। कार्यक्रम का संचालन डॉ. दिलीप बिरुटे ने किया, जबकि आभार प्रदर्शन बामुक्टो के उपाध्यक्ष डॉ. शफी शेख ने किया।

शिक्षा आयोगों की परंपरा की अनदेखी

अपने विस्तारपूर्ण और तथ्यपरक भाषण में डॉ. सुखदेव थोरात ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था के ऐतिहासिक विकास की समीक्षा करते हुए अब तक गठित सभी शिक्षा आयोगों का संक्षिप्त लेकिन आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि कौशल-आधारित शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास, मूल्यपरक शिक्षा और सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण तथा समान शिक्षा जैसे लक्ष्य नए नहीं हैं। ये सभी उद्देश्य पूर्ववर्ती शिक्षा आयोगों द्वारा पहले ही सामने रखे जा चुके हैं।

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “मुद्दा लक्ष्यों का नहीं है, बल्कि यह सवाल अधिक महत्वपूर्ण है कि इन लक्ष्यों को किसके हित में और किसकी कीमत पर लागू किया जा रहा है।”
डॉ. थोरात ने सवाल उठाया कि यदि पूरी शिक्षा व्यवस्था में ‘परिवर्तन’ करना था, तो पहले मौजूदा ढांचे की कमियों की पहचान क्यों नहीं की गई और शिक्षक, विद्यार्थी, अभिभावक, शैक्षणिक संस्थान तथा सामाजिक संगठनों जैसे सभी हितधारकों से व्यापक सुझाव क्यों नहीं लिए गए।

उन्होंने कहा कि कोठारी आयोग सहित पूर्व में गठित सभी शिक्षा आयोग व्यापक विमर्श और सामाजिक भागीदारी की प्रक्रिया से अस्तित्व में आए थे। उच्च शिक्षा में कोठारी आयोग के बाद जो बुनियादी और बड़े बदलाव हुए, उनसे सीख लेना आवश्यक था, लेकिन नई शिक्षा नीति में उन ऐतिहासिक अनुभवों की उपेक्षा दिखाई देती है।

यूजीसी के पुनर्गठन पर तीखी आपत्ति

यूजीसी के संदर्भ में बोलते हुए डॉ. थोरात ने कहा कि उसे चार भागों में विभाजित करने का प्रस्ताव गंभीर रूप से गलत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यूजीसी केवल अनुदान वितरित करने वाली संस्था नहीं है, बल्कि यह उच्च शिक्षा में गुणवत्ता, समन्वय और समानता सुनिश्चित करने वाली एक केंद्रीय संस्था है।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि यूजीसी को कमजोर किया गया, तो उच्च शिक्षा में असंतुलन और अव्यवस्था बढ़ने की पूरी संभावना है।

निजीकरण और बढ़ती असमानता

निजी और विदेशी विश्वविद्यालयों के मुद्दे पर बोलते हुए डॉ. थोरात ने कहा कि ये संस्थान आम और बहुजन समाज के विद्यार्थियों के लिए सुलभ नहीं हैं। विदेशी विश्वविद्यालयों की फीस पर किसी प्रकार का ठोस नियंत्रण नहीं है। ऐसी स्थिति में शिक्षा में समानता कैसे लाई जा सकती है, यह एक गंभीर प्रश्न है।
तीन वर्षीय और चार वर्षीय डिग्री प्रणाली पर उन्होंने कहा कि आर्थिक रूप से सक्षम छात्र ही चार वर्ष की पढ़ाई पूरी कर पाएंगे, जबकि गरीब और वंचित वर्ग के विद्यार्थी तीन वर्ष बाद शिक्षा छोड़ने के लिए मजबूर होंगे। इससे सामाजिक विषमता और अधिक गहरी होगी।

MEME और शोध शिक्षा पर सवाल

Multiple Entry–Multiple Exit (MEME) व्यवस्था की कड़ी आलोचना करते हुए डॉ. थोरात ने कहा कि यह प्रणाली श्रेणीबद्ध मानसिकता को बढ़ावा देती है। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था सभी विद्यार्थियों को समान स्तर तक पहुंचाने के बजाय उन्हें अलग-अलग पड़ावों पर रोकने वाली है।
एम.फिल. पाठ्यक्रम समाप्त किए जाने पर भी उन्होंने असंतोष जताया और कहा कि इस पाठ्यक्रम से विद्यार्थियों में शोध की तैयारी, वैचारिक अनुशासन और आलोचनात्मक दृष्टि विकसित होती थी। इसके साथ ही ऐसे नियम बनाए गए हैं कि विद्यार्थी सीधे पीएच.डी. में प्रवेश नहीं कर सकते, जो शोध की दृष्टि से घातक है।

डॉ. थोरात ने यह भी कहा कि उच्च शिक्षा के लिए दिया जाने वाला अनुदान अत्यंत अपर्याप्त है, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से निजीकरण को बढ़ावा मिल रहा है। इसके परिणामस्वरूप भविष्य में स्थायी प्राध्यापक पदों पर भर्ती कम होने की आशंका है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि शायद शासन शिक्षा को अनुत्पादक क्षेत्र के रूप में देख रहा है, जो बेहद गंभीर स्थिति है।

बहुजन समाज पर पड़ेगा सबसे अधिक प्रभाव

डॉ. थोरात ने जोर देकर कहा कि नई शिक्षा नीति का सबसे अधिक नकारात्मक प्रभाव बहुजन समाज के विद्यार्थियों पर पड़ेगा। उन्होंने कहा, “शिक्षा सामाजिक समानता की कुंजी होनी चाहिए, लेकिन नई नीति के कारण यही कुंजी कमजोर वर्गों के हाथों से खिसकती दिखाई दे रही है।”

अध्यक्षीय भाषण

कार्यशाला की अध्यक्षता करते हुए डॉ. बप्पासाहेब मस्के ने कहा कि नई शिक्षा नीति केवल शैक्षणिक बदलाव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिणाम भी हैं। इसलिए इस नीति पर चर्चा करना, सवाल उठाना और आवश्यक सुधार सुझाना प्राध्यापकों, विद्यार्थियों और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि बामुक्टो केवल विश्वविद्यालयी राजनीति करने वाला संगठन नहीं है, बल्कि वरिष्ठ महाविद्यालयीन प्राध्यापकों के न्यायसंगत अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाला संगठन है। नई शिक्षा नीति के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों के प्रति प्राध्यापकों में जागरूकता फैलाना संगठन का प्रमुख उद्देश्य है।

बड़ी संख्या में शिक्षाविदों की उपस्थिति

इस कार्यशाला में बामुक्टो के उपाध्यक्ष डॉ. शफी शेख, प्रस्तावना प्रस्तुत करने वाले डॉ. मारोती तेगमपुरे, अधिसभा सदस्य डॉ. उमाकांत राठोड, डॉ. विक्रम खिल्लारे, डॉ. संजय कांबळे, कार्यकारिणी सदस्य डॉ. दिलीप बिरुटे, डॉ. लक्ष्मीकांत शिंदे, डॉ. पांडुरंग नवल, डॉ. रामहरी मायकर, डॉ. रामहरी काकडे, डॉ. उषा माने, डॉ. ज्ञानेश्वर देशमुख, डॉ. सचिन चव्हाण, डॉ. विश्वजीत म्हस्के, मराठवाड़ा शिक्षक संघ के केंद्रीय सचिव राजकुमार कदम, मार्गदर्शक डी. जी. तांदळे, बीड जिला अध्यक्ष कालिदास धपाटे सहित अनेक पदाधिकारी और शिक्षाविद उपस्थित रहे।

इसके अलावा नांदेड, परभणी, बीड सहित मराठवाड़ा के विभिन्न जिलों और तालुकों से तथा छत्रपति संभाजीनगर शहर के कई महाविद्यालयों के प्राचार्य, प्राध्यापक और शिक्षण प्रेमी नागरिक बड़ी संख्या में कार्यशाला में शामिल हुए।
उपस्थित प्रतिभागियों ने विषय की गंभीरता और हुई गहन चर्चा को देखते हुए कार्यशाला को अत्यंत विचारोत्तेजक और उपयोगी बताया। समग्र रूप से यह कार्यशाला नई शिक्षा नीति 2020 के सामाजिक प्रभावों पर गंभीर चिंतन के लिए प्रेरक सिद्ध हुई और यह संदेश स्पष्ट रूप से सामने आया कि शिक्षा में समानता, सामाजिक न्याय और जनभागीदारी को केंद्र में रखे बिना कोई भी नीति सफल नहीं हो सकती।

A speaker presenting at a conference or meeting, standing behind a podium. There are several audience members seated in the background, with two framed portraits visible on the walls.
Dr Sukadev Thorat delivering a keynote speech on the New Education Policy 2020 at a workshop in Chhatrapati Sambhajinagar

FAQ : नई शिक्षा नीति 2020 पर डॉ. सुखदेव थोरात की आपत्तियाँ

प्रश्न 1: नई शिक्षा नीति 2020 पर डॉ. सुखदेव थोरात ने क्या मुख्य आपत्ति जताई?

उत्तर: वरिष्ठ अर्थशास्त्री एवं पूर्व यूजीसी अध्यक्ष डॉ. सुखदेव थोरात ने कहा कि नई शिक्षा नीति 2020 को पर्याप्त जनचर्चा, सामाजिक सहभागिता और विभिन्न हितधारकों से सुझाव लिए बिना लागू किया गया, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विपरीत है।


प्रश्न 2: क्या नई शिक्षा नीति के लक्ष्य पहले भी मौजूद थे?

उत्तर: डॉ. थोरात के अनुसार कौशल-आधारित शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मूल्यपरक शिक्षा और समान अवसर जैसे लक्ष्य नए नहीं हैं। ये सभी लक्ष्य पूर्ववर्ती शिक्षा आयोगों द्वारा पहले ही सुझाए जा चुके हैं।


प्रश्न 3: यूजीसी के पुनर्गठन पर डॉ. थोरात की क्या राय है?

उत्तर: डॉ. थोरात ने यूजीसी को चार भागों में विभाजित करने के प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि यूजीसी केवल अनुदान देने वाली संस्था नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा में गुणवत्ता, समन्वय और समानता की गारंटी देने वाली केंद्रीय संस्था है।


प्रश्न 4: नई शिक्षा नीति में निजीकरण को लेकर क्या चिंता जताई गई?

उत्तर: डॉ. थोरात ने कहा कि निजी और विदेशी विश्वविद्यालय आम और बहुजन समाज के छात्रों के लिए सुलभ नहीं हैं। उच्च फीस और नियंत्रण के अभाव से शिक्षा में असमानता बढ़ने की आशंका है।


प्रश्न 5: तीन और चार वर्षीय डिग्री व्यवस्था पर क्या आपत्ति है?

उत्तर: उनके अनुसार आर्थिक रूप से सक्षम छात्र ही चार साल की पढ़ाई पूरी कर पाएंगे, जबकि गरीब छात्र तीन साल बाद शिक्षा छोड़ने को मजबूर हो सकते हैं, जिससे सामाजिक विषमता और गहरी होगी।


प्रश्न 6: Multiple Entry–Multiple Exit (MEME) प्रणाली पर क्या कहा गया?

उत्तर: डॉ. थोरात ने MEME प्रणाली को श्रेणीबद्ध मानसिकता का परिणाम बताया और कहा कि यह सभी छात्रों को समान स्तर तक पहुंचाने के बजाय उन्हें अलग-अलग स्तरों पर रोकने वाली व्यवस्था है।


प्रश्न 7: एम.फिल. पाठ्यक्रम हटाने पर क्या चिंता व्यक्त की गई?

उत्तर: उन्होंने कहा कि एम.फिल. पाठ्यक्रम से शोध की तैयारी, वैचारिक अनुशासन और आलोचनात्मक दृष्टि विकसित होती थी। इसे हटाना शोध और उच्च शिक्षा के लिए नुकसानदायक है।


प्रश्न 8: नई शिक्षा नीति का सबसे अधिक असर किस पर पड़ेगा?

उत्तर: डॉ. थोरात के अनुसार नई शिक्षा नीति का सबसे अधिक नकारात्मक प्रभाव बहुजन समाज और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों पर पड़ेगा।


प्रश्न 9: कार्यशाला कहां और किस विषय पर आयोजित की गई थी?

उत्तर: यह कार्यशाला छत्रपति संभाजीनगर में आयोजित की गई थी, जिसका विषय “नई शिक्षा नीति (2020) और बहुजन समाज का भविष्य” था।


प्रश्न 10: इस कार्यशाला से क्या संदेश सामने आया?

उत्तर: कार्यशाला से यह स्पष्ट संदेश सामने आया कि शिक्षा में समानता, सामाजिक न्याय और जनभागीदारी को केंद्र में रखे बिना कोई भी शिक्षा नीति सफल नहीं हो सकती।


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