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ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड: अंधेरे दौर में रहनुमाई की रौशनी




ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड: अंधेरे दौर में रहनुमाई की रौशनी

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड: अंधेरे दौर में रहनुमाई की रौशनी

✍ विशेष रिपोर्ट: मौलाना आरिफ रहमान, जालना

जालना: देश में जब भी मुस्लिम समाज को किसी प्रकार की सामाजिक, मजहबी या संवैधानिक चुनौती का सामना करना पड़ा है, तब सबसे पहले आवाज़ उठाने वाला तबका रहा है — उलेमा और इस्लामी रहनुमा। इन्हीं प्रयासों की एक मिसाल है ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जो देशभर के मुस्लिम समुदाय की मजहबी और संवैधानिक आज़ादी की रक्षा करने वाला सबसे मजबूत मंच बन चुका है।

बोर्ड की स्थापना 1973 में हैदराबाद में हुई थी, जब शरीअत कानून में हस्तक्षेप की संभावनाओं से चिंता बढ़ रही थी।

उस दौर में देश के तमाम प्रमुख उलेमा, इस्लामी विचारक और समाज के रहनुमा एक मंच पर आए और इस बोर्ड की नींव रखी। इसका मुख्य उद्देश्य था — मुस्लिम पर्सनल लॉ की रक्षा और धार्मिक स्वतंत्रता की हिफाज़त

एकता की बेमिसाल पहल

बोर्ड की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसमें किसी एक विचारधारा का वर्चस्व नहीं रहा। यह सभी फिरकों और विचारधाराओं का एक साझा मंच बना। इसके स्थापक हज़रत मौलाना मिन्नतुल्ला रहमानी रह. ने विभिन्न मतों के उलेमा को एकजुट कर यह सिद्ध किया कि जब उद्देश्य नेक हो, तो एकता संभव है।

1972 में मुंबई के आज़ाद मैदान में आयोजित पर्सनल लॉ कन्वेंशन इस एकता की मिसाल बन गया।

जब हर ओर खामोशी थी, तब यह बोर्ड बोल रहा था

बोर्ड की स्थापना के तुरंत बाद ‘लेपालक विधेयक’ विवाद सामने आया। इसमें गोद लिए गए बच्चे को असली वारिस का दर्जा देने की कोशिश की गई, जो शरीअत के विरुद्ध था। बोर्ड ने सरकार के सामने मजबूती से अपनी बात रखी, और अंततः सरकार को यह बिल वापस लेना पड़ा।

इमरजेंसी के दौर में जब ज़बानें बंद थीं और कलमें टूट चुकी थीं, तब बोर्ड ने जबरन नसबंदी जैसे कानूनों का विरोध किया। हज़रत मिन्नतुल्ला रह. ने “फैमिली प्लानिंग” पर एक पत्रिका प्रकाशित की, जिससे लाखों मुसलमानों को शरीअत आधारित मार्गदर्शन मिला।

44 वर्षों का सफर — संघर्ष, सेवा और सफलता

बोर्ड का कारवां पिछले चार दशकों से अधिक समय से लगातार आगे बढ़ रहा है। आज भी यह संस्था उसी मिशन पर कार्यरत है:

  • मजहबी आज़ादी की रक्षा
  • शरीअत के कानूनों की हिफाज़त
  • मुस्लिम समाज की सामाजिक और नैतिक रहनुमाई

यह यात्रा आसान नहीं थी। विभिन्न फिरकों को जोड़ना, साझा निर्णयों तक पहुँचना और राष्ट्रीय स्तर पर सही नुमाइंदगी करना — यह सब केवल धैर्य और ईमानदारी से ही संभव हुआ।

हज़रत मिन्नतुल्ला रह. के नेतृत्व और ईमानदार कोशिशों से यह मंच आज भी मुसलमानों की आवाज़ बना हुआ है।

निष्कर्ष

आज के दौर में जब मुस्लिम पर्सनल लॉ और शरीअत के अधिकारों को फिर से चुनौती दी जा रही है, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड मजहबी, कानूनी और सामाजिक रहनुमाई की मिसाल बनकर उभरा है।

यह सिर्फ एक संस्था नहीं, बल्कि 20 करोड़ से अधिक मुसलमानों की मजहबी पहचान और संवैधानिक हक़ूक़ की बुलंद आवाज़ है।

© 2025 – यह लेख मौलाना आरिफ रहमान द्वारा लिखा गया है। किसी भी प्रकार की पुनर्प्रकाशन की अनुमति लेखक या स्रोत के हवाले से होनी चाहिए।


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